मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का खोया हुआ शहर है, जिसका इतिहास पुरातत्वविदों को जैसा मोहित करता है वैसा शायद ही कोई और करता हो। पेश हैं मोहनजोदड़ो के 10 रोचक तथ्य, उस प्राचीन और प्रतिष्ठित शहर के बारे में जो सिंधु घाटी सभ्यता के दौर में फला-फूला।
मोहनजोदड़ो का यह खोया हुआ शहर सिंधु घाटी सभ्यता का हिस्सा था और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है, ठीक-ठीक कहें तो लरकाना शहर (सिंध) के ज़िले में।
लगभग 2500 ईसा पूर्व में बसा यह शहर ऐतिहासिक सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी बस्ती था और दुनिया के सबसे शुरुआती शहरों में से एक भी।
लेकिन जैसे-जैसे कोई इस खोए हुए शहर को टटोलता जाता है, मोहनजोदड़ो के बारे में दिलचस्प पहलू सामने आते चले जाते हैं।

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अगर आप गहराई में उतरकर मोहनजोदड़ो शहर के रोचक तथ्य जानना चाहते हैं, तो इस लेख के अंत तक बने रहिए।
मोहनजोदड़ो के 10 रोचक तथ्य: ज़रा गहराई से
मोहनजोदड़ो एक विस्मयकारी प्राचीन शहर था, जो उस महान और भव्य सिंधु घाटी सभ्यता का हिस्सा था। यह सभ्यता समाज के रूप में जीने के अपने (अपने समय के हिसाब से) उन्नत और अनोखे तौर-तरीक़ों के लिए जानी जाती थी।
शहर का असली नाम ठीक-ठीक क्या था, यह अज्ञात है, लेकिन शहर की खोज के बाद यह मोहनजोदड़ो के नाम से मशहूर हो गया।
यह खोया हुआ शहर सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे चमकती झलक था, जहाँ लगभग 40,000 लोग रहते थे।
मोहनजोदड़ो 26वीं सदी ईसा पूर्व में बसा और बना, 17वीं सदी ईसा पूर्व तक फलता-फूलता रहा और फिर आख़िरकार उसका अंत हो गया।
आज शहर के नाम पर जो बचा है, वह है टीले और खंडहर। ये सिंधु नदी के निचले हिस्से के दाहिने किनारे यानी पश्चिम में स्थित हैं, जो सिंध (पाकिस्तान) के लरकाना शहर या ज़िले से जुड़ता है, और प्लाइस्टोसीन रिज (Pleistocene Ridge) पर (सिंधु के बाढ़ के मैदान में) पड़ते हैं।
इस पौराणिक शहर के बारे में जानने को अभी बहुत कुछ है, जिसकी बात यह लेख करेगा।

तथ्य #1 - मोहनजोदड़ो इस प्राचीन शहर का असली नाम नहीं है
जैसा कि शुरुआत में बताया गया, 'मोहनजोदड़ो' नाम शहर का असली नाम नहीं है और इसका असली नाम कोई नहीं जानता।
हालाँकि पुरातत्वविदों और स्थल की खुदाई करने वालों का अनुमान है कि शहर का नाम शायद 'कुक्कुटार्म (Kukkuṭārma)' रहा हो, जिसका अर्थ है 'मुर्गे' या 'कुक्कुट' का शहर। यह नाम इसलिए सुझाया गया क्योंकि मोहनजोदड़ो में मुर्गों की लड़ाई का ख़ास महत्व था और इस गतिविधि को एक अनुष्ठान की तरह देखा जाता था।
मोहनजोदड़ो नाम शहर को एक आधुनिक स्थल-नाम के तौर पर दिया गया, जिसका अर्थ 'मुर्दों का टीला' समझा या बताया जा सकता है।
तथ्य #2 - पतन के बाद 3,700 साल तक शहर के खंडहरों का कोई दस्तावेज़ नहीं बना
प्राचीन शहर मोहनजोदड़ो के बारे में एक और रोचक तथ्य यह है कि इस प्राचीन शहर के ढह जाने के 3,700 साल बाद तक इसे न खोजा गया और न ही इसका कोई दस्तावेज़ बना।
एक भारतीय पुरातत्वविद्, राखालदास बनर्जी (Rakhal Dash Banerji) 1919 से 1920 के बीच आज के मोहनजोदड़ो पहुँचे, और वहीं इस खोए हुए शहर की खोज हुई। ऐसी महत्वपूर्ण कलाकृतियाँ मिलने के बाद उन्हें शहर की प्राचीनता का पूरा यक़ीन हो गया, जो सिंधु घाटी सभ्यता के इस महान शहर के प्रागैतिहासिक अस्तित्व की ओर इशारा करती थीं।
उसके बाद शहर में कई खुदाइयाँ हुईं, जिन्होंने इसके इतिहास और विरासत में और भी बहुत कुछ जोड़ा।
तथ्य #3 - मोहनजोदड़ो में बहुमंज़िला इमारतें थीं
मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे विस्मयकारी शहरों में से एक था और बुनियादी ढाँचे के मामले में अपने समय से बहुत आगे था।
इस प्राचीन शहर में कई बहुमंज़िला इमारतें थीं, जिन्हें सोच-समझकर और मक़सद के साथ इस तरह बनाया गया था कि वे यहाँ के बाशिंदों की परिष्कृत जीवनशैली के अनुकूल हों।
उनकी बहुमंज़िला इमारतों और निर्माणों में बड़ी गलियाँ थीं, जिनमें अलग-अलग स्नानघर और शौचालय होते थे, साथ ही बीच में एक आँगन, जिसके चारों ओर अलग-अलग कमरे बने होते थे।
शहर के अमीर या उच्च वर्ग के लोगों के पास तो बहुउद्देश्यीय, तीन मंज़िला इमारतें तक होती थीं।
तथ्य #4 - विशाल स्नानागार महज़ एक सार्वजनिक कुंड नहीं, आध्यात्मिक महत्व का स्थान था
अगर आपने मोहनजोदड़ो के बारे में पढ़ा है, तो बहुत मुमकिन है कि आपने 'विशाल स्नानागार' (The Great Bath) के बारे में भी पढ़ा या सुना हो, जो शहर में ख़ास मक़सद से बनाया गया एक सार्वजनिक कुंड था।

स्थल के विशाल स्नानागार का दृश्य, जिसमें आसपास की शहरी बनावट दिखती है
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प्राचीन शहर के मुख्य दुर्ग परिसर (Citadel Complex) में स्थित यह सार्वजनिक कुंड, यानी विशाल स्नानागार, लोगों के नहाने भर का कोई आम कुंड नहीं था। बल्कि मोहनजोदड़ो के बाशिंदों के लिए इसका आध्यात्मिक महत्व था।
अपने आप में एक वास्तुशिल्पीय उत्कृष्ट कृति, मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार के बारे में माना जाता है कि यह एक आध्यात्मिक स्नान-स्थल था, जो बाशिंदों को उनकी सारी अशुद्धियों से मुक्त कर देता था।
यह भी माना जाता है कि विशाल स्नानागार के इर्द-गिर्द अनुष्ठान होते थे, जिनमें इस प्रतिष्ठित कुंड में भरे पवित्र जल से मनुष्यों का शुद्धिकरण किया जाता था। इस बात को इस तथ्य से और बल मिलता है कि विशाल स्नानागार के परिसर के उत्तर और दक्षिण की ओर बड़े-बड़े प्रवेश द्वार बने हैं। हालाँकि यह आज भी पता नहीं है कि इन द्वारों तक पहुँच किसे हासिल थी, पर माना जाता है कि ये विशाल स्नानागार के अनुष्ठानिक प्रवेश द्वार थे।
तथ्य #5 - शहर के लोगों को गहने और आभूषण पहनने का शौक़ था
वैसे तो गहने अलग-अलग प्रागैतिहासिक समाजों का एक दिलचस्प पहलू रहे हैं, लेकिन मोहनजोदड़ो के लोग उस दौर में गहनों के ख़ास शौक़ीन मालूम होते हैं।
शहर के अवशेषों और खंडहरों ने मोहनजोदड़ो के बाशिंदों की अनूठी जीवनशैली की ओर इशारा किया और बताया कि उन्हें आभूषण पहनना बेहद पसंद था, जिन्हें वे क़ीमती धातुओं और पत्थरों से बनाते थे।
अर्ध-क़ीमती पत्थरों और सोने से बना वह प्रतिष्ठित और नफ़ीस सात लड़ियों वाला हार भी मोहनजोदड़ो के स्थल से खुदाई में मिला था।
तथ्य #6 - मोहनजोदड़ो का समाज मातृसत्तात्मक था
यह जानना दिलचस्प है कि मोहनजोदड़ो के बाशिंदे मातृसत्ता को मानते थे और स्त्रियों को घर-परिवार की मुखिया का दर्जा देते थे।
इस बात की पुष्टि मातृ देवी शाकंभरी की अनेक टेराकोटा मूर्तियों की खोज से हुई, जो मोहनजोदड़ो के लोगों की सांस्कृतिक मान्यताओं की ओर इशारा करती हैं और स्त्री-शक्ति और स्त्री-प्रधानता का संकेत देती हैं।

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तथ्य #7 - मोहनजोदड़ो का रहस्यमय नरसंहार
मोहनजोदड़ो में जो नरसंहार या विपदा घटी, जिसके बारे में माना जाता है कि उसी ने इस प्राचीन शहर के विनाश और सर्वनाश का रास्ता खोला, उस पर कई इतिहासकारों की राय आपस में टकराती है। यह आज भी तय नहीं है कि वह नरसंहार किसी आक्रमण का नतीजा था या कोई प्राकृतिक आपदा इस प्राचीन शहर पर टूट पड़ी और उसे गुमनामी की खाई में धकेल गई।
स्थल के खंडहरों की खुदाई किसी प्रचंड प्राकृतिक आपदा की आशंका जताती है, जैसे कोई विनाशकारी बाढ़ या कोई ज़बरदस्त भूकंप। हाल के अध्ययन यह भी संकेत देते हैं कि मोहनजोदड़ो का अंत जलवायु परिवर्तन का नतीजा था।
हालाँकि कुछ लोग मानते हैं कि मोहनजोदड़ो पर आर्यों का आक्रमण ही वह वजह थी जिसने इस प्राचीन शहर को लूटकर पूरी तरह मिटा दिया। दरअसल इतिहासकारों को शहर के परिसर के भीतर कंकाल मिले, जिनके आधार पर उनमें से कुछ यह मानने लगे कि इस महान शहर का अंत, या मोहनजोदड़ो में हुआ नरसंहार, किसी बाहरी आक्रमण का नतीजा था।
तथ्य #8 - आने-जाने का ज़रिया थे घोड़े और बैलगाड़ियाँ
पुरातत्वविदों को मोहनजोदड़ो के स्थल से मिट्टी की बनी एक बैलगाड़ी मिली, जो संभवतः यह दिखाती है कि मोहनजोदड़ो के लोग एक जगह से दूसरी जगह कैसे आते-जाते थे।
इसके साथ ही सिंधु घाटी सभ्यता में रोज़मर्रा के आवागमन और परिवहन के लिए सफ़ेद घोड़ों का भी इस्तेमाल होता था। यानी मोहनजोदड़ो के लोग सफ़र और आने-जाने के लिए बैलगाड़ियों के साथ-साथ घोड़ों का भी इस्तेमाल करते थे।
तथ्य #9 - मोहनजोदड़ो में उन्नत शौचालय और जल-निकासी व्यवस्था थी
17वीं सदी ईसा पूर्व के किसी शहर की कल्पना करना काफ़ी मुश्किल है जिसके पास उन्नत और समर्पित जल-निकासी व्यवस्था के साथ-साथ अलग-अलग शौचालय भी हों।
लेकिन इस शहर के पास (अपने समय के हिसाब से) एक उन्नत जल-निकासी व्यवस्था थी, जिसमें उच्च स्तर की बारीकी और नगर-नियोजन झलकता था। शहर के खंडहर दिखाते हैं कि जल-निकासी व्यवस्था और कचरा-प्रबंधन व्यवस्था कितनी सोच-समझकर बनाई गई थी और पूरे शहर में फैली हुई थी।
और भी दिलचस्प बात यह है कि इस व्यवस्था की नालियाँ ढकी हुई भी थीं, ताकि सुविधा और स्वच्छता बनी रहे।
मोहनजोदड़ो के घर अलग-अलग शौचालयों और स्नानघरों के साथ बनाए जाते थे, जो जल-निकासी व्यवस्था से जुड़े होते थे।
तथ्य #10 - मोहनजोदड़ो के लोग शिव से मिलती-जुलती एक आकृति की पूजा करते थे

मोहनजोदड़ो के स्थल से मिली पशुपति मुहर (Pashupati Seal) यह संकेत देती है कि मोहनजोदड़ो के लोग एक ऐसी आकृति की पूजा करते थे, जो देखने में शिव की शारीरिक विशेषताओं से मेल खाती लगती है।
इस बात की पुष्टि पशुपति मुहर की उस छवि से होती है, जिसमें आज के शिव जैसी ही एक योग मुद्रा दिखाई देती है।
पशुपति मुहर पर उस आकृति के चारों ओर जंगली जानवरों के चित्र भी बने हैं, जो यह भी संकेत देते हैं कि आकृति में दिखने वाले व्यक्ति को रक्षक या क़बीले का मुखिया माना जाता था।
जानने लायक़ बात: ईसा पूर्व यानी 'बिफ़ोर द कॉमन एरा' (BCE) की समयरेखा गिनती के लिहाज़ से दरअसल उलटी चलती है। इसका मतलब है कि 26वीं सदी ईसा पूर्व, 19वीं सदी ईसा पूर्व से पहले आई।
अंतिम विचार
मोहनजोदड़ो महान सिंधु घाटी सभ्यता का एक विस्मयकारी शहर था, और आज यह दुनिया के सबसे ज्ञानवर्धक और अनोखे पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है।
यह स्थल और आज के दौर की खुदाइयाँ इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को लगातार चकित करती रहती हैं।
शायद समय के साथ, जैसे-जैसे और खुदाइयाँ और खोज-यात्राएँ होंगी, और भी रहस्य और तथ्य सामने आते रहेंगे।