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पृथ्वी और मानव जाति की रचना कैसे हुई? प्राचीन कथाएँ क्या कहती हैं

जानिए प्राचीन कथाओं के अनुसार दुनिया की रचना कैसे हुई। यह लेख आपको पान गू, नू वा और यहोवा की समृद्ध और विविध कथाओं की गहराइयों में ले जाता है।

लेखक: · 22 मार्च 2023 · 13 मिनट में पढ़ें

क्या आपने कभी सोचा है कि प्राचीन कथाओं के अनुसार यह दुनिया बनी कैसे? आप अकेले नहीं हैं। मानव सभ्यता की शुरुआत से ही लोग इस रहस्य से मोहित रहे हैं कि पृथ्वी अस्तित्व में कैसे आई!

सदियों से लोग हमारे ग्रह की उत्पत्ति पर विचार करते आए हैं। अलग अलग संस्कृतियों और समाजों ने दुनिया की रचना के बारे में अपने अपने मिथक और कथाएँ गढ़ी हैं, जो इस बुनियादी सवाल का जवाब देने के लिए अक्सर अलौकिक और प्राकृतिक तत्वों को मिला देती हैं।

ये प्राचीन कहानियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं और आज भी हमारे ग्रह की उत्पत्ति को लेकर हमारी जिज्ञासा जगाती हैं। पृथ्वी की रचना से जुड़ी प्राचीन कथाएँ मनमोहक हैं और समय के साथ धूमिल नहीं पड़ीं।

गाया और यूरेनस की यूनानी कथा से लेकर यमीर और विशाल गाय की नॉर्स कहानी तक, फारसी मश्या और मश्याना (Mashya and Mashyana) की कथा से लेकर सुमेरी सृष्टि-कथा और भारत के हिरण्यगर्भ मिथक तक, दुनिया की रचना को लेकर सांस्कृतिक मान्यताओं और मिथकों का महत्व साफ हो जाता है, क्योंकि ये सभी चीज़ों को देखने के समृद्ध और विविध नज़रियों की झलक देते हैं।

इस ब्लॉग पोस्ट में हम दो सबसे दिलचस्प और कालजयी प्राचीन सृष्टि-कथाओं की सैर करेंगे: चीनी सृष्टि-कथाएँ और बाइबल के अनुसार यहोवा की रचना। हम उन मान्यताओं और कहानियों को टटोलेंगे जिन्होंने यह समझने में हमारी मदद की है कि दुनिया की शुरुआत कैसे हुई। तो आराम से बैठिए और पृथ्वी की रचना से जुड़ी प्राचीन कथाओं की समृद्ध और विविध दुनिया में उतरने के लिए तैयार हो जाइए!

चीनी सृष्टि-कथा

पान गू की कथा

Wang Qi (1529-1612), Public domain, via Wikimedia Commons

चीनियों की सृष्टि-कथा का इतिहास और पुराणशास्त्र बहुत समृद्ध है, और इसकी कथाएँ प्राचीन काल तक जाती हैं। चीनी कथा के अनुसार ब्रह्मांड और मनुष्यों की रचना हुन-तुन (Hun-tun) नाम के आदिम अराजक तत्व से हुई। उसी अराजकता में से पान गू (Pan Gu) एक अंडे के रूप में प्रकट हुआ, और फिर वह अंडा फोड़कर बाहर निकल आया, जिससे ब्रह्मांड में प्रकाश और जीवन फैल गया।

अंडे जैसा दिखता एक खगोलीय पिंड, Photo by NASA on Unsplash
Photo by NASA on Unsplash

वह ब्रह्मांड की दो विरोधी शक्तियों, यिन और यांग, के बीच खड़ा था। एक विशालकाय प्राणी, जिसके दो सींग थे, दो लंबे गजदंत थे, मुँह से बाहर झाँकते नुकीले दाँत थे, और बालों से ढका शरीर था, जो बाकी प्राणियों और मनुष्यों के ऊपर पहाड़ सा उठा हुआ था।

उसने अपने शरीर से आकाश और पृथ्वी को अलग किया, सूर्य, चंद्रमा, तारों और ग्रहों को उनकी जगह पर स्थिर किया, और चारों समुद्रों का बँटवारा किया। पृथ्वी को आकार देने के लिए उसने घाटियाँ तराशीं और पर्वतों के ढेर लगाए। यह सब पान गू की यिन-यांग की समझ से संभव हुआ, यानी हर चीज़ में मौजूद द्वैत के उस सिद्धांत से जिससे कोई बच नहीं सकता।

Image by Arek Socha from Pixabay

उसके शरीर के अंग बल और प्रचंडता, अपार शक्ति और सत्ता के प्रतीक हैं। पान गू का शरीर मनुष्य का और सिर पशु का था, जो मानव जगत और पशु जगत के बीच सेतु के रूप में उसकी भूमिका का प्रतीक है।

उसे "पान कुएई" (P'an K'uei), "पा कुआ" (Pa Kua) और "पान कू" (P'an Ku) नामों से भी जाना जाता है। प्राचीन चीनी कथाओं में पान गू को पहला जीवित प्राणी और बाकी सभी प्राणियों का पूर्वज माना जाता है। उसे आमतौर पर लंबी दाढ़ी वाले उस दैत्य के रूप में जाना जाता है जो पत्थर गढ़ने और तराशने के लिए छेनी और हथौड़ा थामे रहता है, और यही उसकी दुनिया के रचयिता और शिल्पकार की भूमिका का प्रतीक है।

एक और कथा के अनुसार पान गू अराजकता में से निकला और उसने आकाश और पृथ्वी को अलग करके दुनिया की रचना की। कहा जाता है कि इस काम में उसे 18,000 वर्ष लगे। उसकी साँसें हवा बन गईं, उसकी आवाज़ गरज बन गई, उसकी बाईं आँख सूर्य बनी और दाईं आँख चंद्रमा।

पान गू बढ़ता ही गया, और जब उसका काम पूरा हुआ, तो वह विश्राम के लिए लेट गया। उसका शरीर पर्वत बन गया, उसकी साँसें हवा और उसकी आवाज़ गरज। उसके बाल पेड़ों में बदल गए और उसकी नसें नदियों में।

नसों जैसी दिखती नदियाँ
Photo by NASA on Unsplash

पान गू को अक्सर दाओवादी अवधारणा "दाओ" (Dao) से जोड़ा जाता है, जो परम सत्य और ब्रह्मांड की हर चीज़ का स्रोत है। दाओवादी मान्यता के अनुसार पान गू इस बात का प्रतीक है कि दाओ ने ब्रह्मांडीय विकास की एक प्रक्रिया के ज़रिए दुनिया की रचना की।

पान गू चीनी संस्कृति और विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। उसकी कहानी चीन में घर घर जानी जाती है और साहित्य, कला और लोकप्रिय संस्कृति में उसका ज़िक्र बार बार आता है। इसके अलावा पान गू चीनी लोककथाओं और अनुष्ठानों की एक अहम शख्सियत है। सौभाग्य और समृद्धि पाने के अनुष्ठानों में उसका आह्वान अक्सर किया जाता है, और उसकी कथाएँ और लोककहानियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहती हैं।

नू वा और फू शी

चीनी लोकधर्म में देवी नू वा (Nuwa), जिसे नू गुआ (Nugua) भी कहा जाता है, मातृदेवी और समस्त मानवता की रचयिता है। चीनी पुराणकथाओं में नू वा को आधा मानव, आधा सरीसृप दिखाया जाता है, जिसका शरीर सर्प का और सिर एक मानव स्त्री का है।

चीनी पुराणकथाओं की देवी नू वा
चिंग राजवंश के ग्रंथ "गुजिन तूशू जीचंग" (Gujin Tushu Jicheng) से नू वा का चित्र। Chen Menglei, Public domain, via Wikimedia Commons

उसका सर्प से जुड़ाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि साँपों को बहुत पहले से उर्वरता से जोड़ा जाता रहा है। मंदारिन में उसे औपचारिक रूप से वाहुआंग (Wahuang) कहा जाता है, जिसका अर्थ है लेडी वा या साम्राज्ञी वा। यहाँ हम नू वा के बारे में प्रमुख चीनी पौराणिक कथाएँ बता रहे हैं, जिनमें वह एक साथ माँ भी है और प्रकृति, व्यवस्था, विवाह और उर्वरता की देवी भी, मनुष्यों की रचयिता और रक्षक भी, और एक विचित्र प्राणी भी।

मातृदेवी

हालाँकि नू वा ने पृथ्वी या ब्रह्मांड की रचना नहीं की, एक सृष्टि-कथा में उसे वह मातृदेवी बताया गया है जिसने गीली मिट्टी से मनुष्य गढ़े और उनमें प्राण फूँके। शुरुआत में नू वा अकेली पृथ्वी पर भटकती थी। पानी में अपना प्रतिबिंब देखने के बाद उसने गीली मिट्टी से अपनी ही छवि में प्राणी गढ़े। जब मिट्टी की ये आकृतियाँ जीवित हो उठीं, तो उसने उन्हें मनुष्य कहा। जिन मनुष्यों को उसने बड़ी मेहनत से हाथ से गढ़ा था, वे राजवंशी बने। जब वह हाथ से मिट्टी गढ़ते गढ़ते थक गई, तो उसने कीचड़ में सनी एक रस्सी घुमाई, और रस्सी से गिरे लोंदे किसान-मज़दूर बन गए।

विवाह की देवी

एक और सृष्टि-कथा में नू वा पहली पत्नी और माँ थी, जिसने मानवता को जन्म दिया। वहीं एक अन्य सृष्टि-कथा में देवी नू वा और उसका भाई फू शी (Fuxi) एक प्रलयकारी बाढ़ में बचे इकलौते प्राणी थे।

फू शी
फू शी, मिंग राजवंश के चिउ यिंग (Qiu Ying) की बनाई पेंटिंग, जैसा Orthodoxy of Rule Through the Ages में चित्रित है
By Qiu Ying - Prologue: The Inspiration from Nature. Viewing Nature in Chinese Art: A Special Exhibit of Select Artifacts from the Museum Collection to Celebrate the 2016 Tang Prize (2016 exhibit). Taipei: National Palace Museum., Public Domain, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=64059499

लेकिन भाई-बहन होने के कारण वे दैवीय अनुमति के बिना संतान पैदा नहीं कर सकते थे। उन्होंने दो पर्वत चोटियों पर आग जलाई और धुएँ को उठते देखा। धुएँ के दोनों स्तंभ ऊपर नहीं उठे, बल्कि आपस में लिपटकर एक हो गए, और उन्होंने इसे स्वर्ग की ओर से अपने मिलन की स्वीकृति का संकेत माना। बाद में नू वा और उसके भाई फू शी ने विवाह किया और वे पृथ्वी की समस्त मानवता के माता-पिता बने। कथा यह भी बताती है कि नू वा ने अपनी रचना के लिए विवाह की प्रेरणा कैसे दी। उसने देखा कि नए-नए बने मनुष्य अकेले हैं और उन्हें साथ की ज़रूरत है, इसलिए उसने उन स्त्री-पुरुषों के टखनों में लाल धागा बाँध दिया जिनका मिलना तय था। यह लाल धागा दोनों को एक दूसरे के पास ले आता, ताकि वे एक दूसरे को खोज सकें और विवाह कर सकें। इस तरह उसने विवाह की संस्था और उससे जुड़ी परंपराओं की स्थापना की।

नू वा की एक और कथा

एक और कथा में नू वा ने स्वर्ग और पृथ्वी के बीच पड़ी दरार को भरकर मनुष्यों को बचाया। जब जल के देवता गोंगगोंग (Gonggong) और अग्नि के देवता चूरोंग (Zhurong) इस बात पर लड़ पड़े कि स्वर्ग पर राज कौन करेगा, तो उस पौराणिक युद्ध ने आसमान में छेद कर दिया, और उनके क्रोध से पृथ्वी पर जगह जगह आग लगी और बाढ़ें आईं। आखिरकार गोंगगोंग ने आसमान फाड़ डाला, जिससे पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। नू वा ने आकाश-कछुए की टाँगों और पाँच रंग-बिरंगे तत्व-पत्थरों की मदद से स्वर्ग के स्तंभों और आसमान के छेद की मरम्मत की। हालाँकि इस कहानी के दो अलग अलग अंत हैं। एक में नू वा आसमान की मरम्मत के बाद थकान से मर जाती है। दूसरे में वह आसमान को जोड़कर स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था लौटाने के लिए खुद का बलिदान कर देती है।

देवी नू वा आसमान की मरम्मत करती हुई
By Xiao Yuncong, 1596-1673 - Public Domain, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=91006222

लेकिन मरम्मत पूरी तरह सही नहीं हो पाई, जिससे पृथ्वी अपनी धुरी पर झुक गई। दोनों कहानियों में नू वा दुनिया की व्यवस्था लौटाने और मानवता को बचाने के लिए बलिदान देती है।

ये कथाएँ ब्रह्मांड में संतुलन और सामंजस्य के महत्व को दिखाती हैं, और साथ ही दुनिया की रचना और उसे सँभालने में शक्तिशाली देवी-देवताओं की भूमिका को भी। ये मानवता और सृजन के मूल्य पर भी ज़ोर देती हैं, चाहे वह मिट्टी से मनुष्यों की रचना हो या महाप्रलय के बाद आसमान की मरम्मत।

इन कथाओं ने बेशक हज़ारों वर्षों से चीनी संस्कृति और पुराणशास्त्र को गढ़ा है, और ये आज भी हमें प्रेरित और चकित करती हैं।

यहोवा की सृष्टि-कथा

इब्रानियों की सृष्टि-कथा की समय के साथ अनेक व्याख्याएँ हुई हैं। कुछ लोग इसे ईश्वर और मनुष्यों के रिश्ते का रूपक मानते हैं, तो कुछ इसे ब्रह्मांड की रचना का शब्दशः सही विवरण। व्याख्या चाहे जो हो, इस सृष्टि-कथा ने लोगों की सोच और आचरण पर गहरा असर डाला है।

Photo by Aaron Burden on Unsplash

इब्रानी बाइबल के अनुसार यहोवा ही एकमात्र सच्चा ईश्वर है, जिसने ब्रह्मांड और उसकी हर चीज़ की रचना एक ही उद्देश्य से की: अपनी महिमा के लिए! कहानी उत्पत्ति ग्रंथ (Genesis) से शुरू होती है, जहाँ यहोवा ने 6 दिनों में पृथ्वी और उसके वासियों की रचना की और सातवें दिन विश्राम किया। उन 6 दिनों में हर दिन उसने कुछ नया रचा। पर रचने का उसका तरीका एक ही था: हर दिन वह जो रचना चाहता, उसे पुकार देता, और वह हो जाती।

स्विट्ज़रलैंड के ओल्टेन स्थित सेंट मार्टिन चर्च की वेदी के ऊपर बना अर्ध-गुंबद, 1910 में पूर्ण।
pvasiliadis, CC BY-SA 3.0 http://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0/, via Wikimedia Commons

ईश्वर ने खुद को विस्तारित करके और अपनी ऊर्जा मुक्त करके ब्रह्मांड की रचना की प्रक्रिया शुरू की। ऐसा इसलिए कि वह स्वयं प्रकाश का साक्षात रूप था (ब्रह्मांड की हर चीज़, पानी समेत, प्रकाश से बनी है, और वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि ब्रह्मांड प्रकाश की गति से फैलता जा रहा है)।

पहले दिन उसने प्रकाश को अंधकार से अलग किया, जिससे दिन और रात बने।

दूसरे दिन ईश्वर ने अंतरिक्ष का विस्तार (फर्मामेंट) रचा। इस विस्तार ने पृथ्वी को आकाश से अलग कर दिया।

तीसरे दिन उसने दो अलग अलग चीज़ों को पुकारा। एक थी थल और जल की अलगाई। दूसरी थी वनस्पति। ये कोई बेतरतीब काम नहीं थे, बल्कि जीवन की निरंतरता के लिए सोची-समझी व्यवस्था थी। यहोवा ने इकट्ठे किए पानी को समुद्र कहा, और हर तरह की वनस्पति के भीतर बीज रोपे, "हर एक अपनी अपनी जाति के अनुसार।" इस तरह जीवन, जैसा हम आज जानते हैं, तीसरे दिन शुरू हुआ, और यहोवा ने देखा कि यह अच्छा है।

सूर्य, चंद्रमा और तारों की रचना चौथे दिन का काम था। यहोवा ने उन्हें समय और ऋतुओं पर शासन करने के लिए स्थापित किया, और तब तक बने रहने के लिए जब तक पृथ्वी है। फिर उसने अपनी रचना को देखा और उसे अच्छा पाया।

पाँचवें दिन यहोवा ने और जीवन रचा: विशाल समुद्री जीव और पानी में कुलबुलाने वाला हर चलता-फिरता प्राणी, अपनी अपनी जाति के अनुसार, और हर पंख वाला पक्षी अपनी जाति के अनुसार।

सृष्टि के छठे दिन ईश्वर ने तरह तरह के सभी पशु और मनुष्य रचे। कहा जाता है कि उसने मनुष्य को अपनी ही छवि में रचा, उसे मिट्टी से गढ़कर और उसके नथुनों में जीवन की साँस फूँककर।

अपने सृजन-कार्य के अंतिम दिन यहोवा ने विश्राम किया।

सृष्टि-कथा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह है जब मनुष्यों की पहली बार रचना हुई। यह कथा मानती है कि यहोवा ने मानवता को अपनी छवि में बनाया और उसे इस ग्रह पर अधिकार दिया। इसीलिए मनुष्यों को यहोवा की सृष्टि में खास जगह मिली है और उन्हें दुनिया के सभी जीवों की देखभाल का दायित्व सौंपा गया है, जिसमें पर्यावरण, पशु और दूसरे जीवधारी शामिल हैं। हमसे आग्रह किया गया है कि हम दुनिया के साथ अच्छा व्यवहार करें और उसके संसाधनों का समझदारी से उपयोग करें। यह दायित्व सिर्फ एक कर्तव्य नहीं है, बल्कि परम सत्ता और अपने साथी मनुष्यों के प्रति अपना प्रेम दिखाने का अवसर भी है।

यह उत्पत्ति-कथा हमें याद दिलाती है कि ब्रह्मांड में हम अकेले प्राणी नहीं हैं, मगर हम यहाँ किसी मकसद से हैं। मनुष्य परमाणुओं के महज़ बेतरतीब ढेर नहीं हैं; हम ईश्वर की छवि में रचे गए हैं


दोनों प्राचीन कथाएँ दुनिया और उसमें बसने वाले प्राणियों की रचना की बात करती हैं, फिर भी चीनी कथा धीरे धीरे होते विकास और बदलाव की प्रक्रिया के विचार पर ज़ोर देती है, जबकि बाइबल की कहानी यहोवा के सृजन-कार्य की शक्ति और गति को उभारती है।

इसके अलावा चीनी कथा विरोधी शक्तियों के बीच संतुलन के विचार पर केंद्रित है, जबकि बाइबल की कहानी एक प्रेममय, सर्वशक्तिमान ईश्वर के विचार पर ज़ोर देती है, जो अपने उद्देश्यों के लिए दुनिया की रचना करता है