बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी जड़ें प्राचीन भारत में हैं और यह सिल्क रोड (प्राचीन चीनी सभ्यता का एक व्यापार मार्ग) से होते हुए एशिया तक पहुंचा? जी हां, बौद्ध धर्म के सबसे पुराने प्रमाण भारत से ही मिले हैं, जहां आज भी लोगों का एक वर्ग इसे पूरी श्रद्धा से मानता है। इस लेख में हम लद्दाख, भारत के शीर्ष 10 बौद्ध मठों पर नज़र डालेंगे।
रेगिस्तान और दो कूबड़ वाले ऊंटों का घर लद्दाख भारत के उत्तरी हिस्से में स्थित है। ऊंचाई पर बसा यह क्षेत्र विशाल हिमालय की गोद में टिका है और विशाल सियाचिन ग्लेशियर तक फैला हुआ है। स्थानीय आबादी क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में दूर-दूर तक फैली है, ठीक वैसे ही जैसे बौद्ध मठ और गोम्पा, जो दूरदराज़ और एकांत जगहों पर बसे हैं। लद्दाख अपनी मनमोहक घाटियों और विविध संस्कृति के लिए जाना जाता है।
यहां के विशाल पहाड़ों और खड़ी सड़कों ने इस इलाके में बौद्ध धर्म को फलते-फूलते देखा है, और तरह-तरह के मठ और स्तूप इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। बौद्ध धर्म लद्दाख में पहली या दूसरी सदी ईस्वी में सम्राट अशोक के शासनकाल में पहुंचा, जिन्होंने अपने लोगों को इस क्षेत्र में जाकर भगवान बुद्ध की शिक्षाएं फैलाने का आदेश दिया था। हालांकि, 7वीं सदी में जब लद्दाख तिब्बती साम्राज्य का हिस्सा बना, तभी जाकर बौद्ध धर्म को बहुत से लोगों ने अपनाया और यह स्थानीय लोगों के जीवन का एक प्रमुख हिस्सा बन गया।
12वीं सदी के दौर में कदम्पा उपसमूह की देखरेख में मठों का निर्माण शुरू हुआ। इस दौर में स्थापित सबसे पुराने मठों में लिकिर, थिकसे और स्पितुक शामिल हैं, जिनके बारे में हमने अगले भाग में विस्तार से बात की है।
आइए अब लद्दाख के कुछ मशहूर बौद्ध मठों पर एक नज़र डालते हैं।
लद्दाख में घूमने लायक शीर्ष 10 बौद्ध मठ
हेमिस मठ (Hemis Monastery)

हेमिस मठ लेह और तिब्बत का सबसे समृद्ध मठ है, जिसके निर्माण का आदेश तत्कालीन राजा सेंगे नामग्याल ने दिया था। माना जाता है कि उन्होंने 1630 में हेमिस की जागीर लामा स्टागत्सांग रास्पा को सौंपी थी। 1632 में यहां कई कमरों और सभागारों का निर्माण शुरू हुआ, खास तौर पर त्सोग खांग का, जो भिक्षुओं का सभा भवन है। यह लेह क्षेत्र का सबसे बड़ा मठ भी है और लेह से 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह सिंधु नदी के दक्षिणी तट पर बसा है, जो इसे देखने के लिहाज़ से और भी मनमोहक और खूबसूरत बना देता है।
मठ में दो कमरे खास मकसद के लिए समर्पित हैं। एक है ल्हामोखांग, जिसमें पालदो ल्हामो नाम के रक्षक देवता विराजते हैं, और दूसरा गुरु लाखांग, जिसमें गुरु पद्मसंभव की 8 मीटर ऊंची प्रतिमा स्थापित है।
मठ चारों ओर से खूबसूरत रंग-बिरंगी पताकाओं से घिरा है। बौद्ध धर्म में इन प्रार्थना पताकाओं का बड़ा महत्व है, माना जाता है कि पताकाओं का फहराना भगवान बुद्ध तक प्रार्थनाएं पहुंचाने का एक तरीका है।
हालांकि, यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है वार्षिक त्सेचू, जिसे हेमिस उत्सव के नाम से जाना जाता है। गुरु पद्मसंभव को समर्पित यह दो दिन का आयोजन जून और जुलाई के महीने में होता है। उत्सव के दौरान ढोल और झांझ की थाप और लय पर छम नृत्य किया जाता है। विशाल थांगका (बौद्ध चित्र) आम लोगों के दर्शन के लिए खोले जाते हैं।
मठ में एक संग्रहालय भी है, जहां सदियों पुराने चित्र आम लोगों के लिए प्रदर्शित हैं। दुनिया भर से पर्यटक हेमिस मठ आते हैं ताकि बौद्ध धर्म के बारे में जान सकें और बौद्ध देवी-देवताओं की प्रतिमाओं और चित्रों के दर्शन कर उनका आशीर्वाद पा सकें।
स्पितुक मठ (Spituk Monastery)

एक और खूबसूरत बौद्ध मठ जो ढेरों पर्यटकों का ध्यान खींचता है, वह है स्पितुक मठ, जिसे स्पितुक गोम्पा या पेथुप गोम्पा भी कहा जाता है। इसे 11वीं सदी में ओद-दे (Od-de) ने बनवाया था और आज यह लगभग 100 भिक्षुओं का घर है। यह मठ लेह से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां एक स्कूल है जहां पर्यटकों का जाना मना है, और एक चिंतन कक्ष भी है जहां आगंतुक अपनी सुविधा के अनुसार बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं। मठ में दुखांग नाम का एक सभा भवन है और साथ ही दोलमा लाखांग और चोखांग जैसे छोटे मंदिर भी हैं।

इस मठ ने बौद्ध धर्म की सांस्कृतिक विरासत को शानदार ढंग से संजोकर रखा है। यहां सबसे पुरानी कलाकृतियां, प्रतिमाएं और भित्ति चित्र बेहतरीन हालत में हैं। इसके अलावा, दीवार पर भगवान बुद्ध के पुनर्जन्म के चित्र देखे जा सकते हैं, जो दूर-दूर से पर्यटकों को खींच लाते हैं। इनके अलावा मठ में प्राचीन मूर्तियां, धर्मग्रंथ और अवशेष भी प्रदर्शित हैं।

स्पितुक के प्रमुख लामा को लद्दाख का प्रमुख लामा भी माना जाता है। स्पितुक अपने वार्षिक स्पितुक गुस्तोर उत्सव के लिए पर्यटकों को आकर्षित करता है, जो जनवरी और फरवरी के महीने में होता है। यह उत्सव विश्व शांति और लोगों के बीच सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। सलाह दी जाती है कि मठ की और उसके आसपास की खूबसूरती निहारने के लिए दोपहर के समय यहां जाएं।
थिकसे मठ (Thiksey Monastery)

मध्य लद्दाख के सबसे बड़े मठों में से एक है थिकसे मठ। यह लेह से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे 1430 ईस्वी में शेरब ज़ांगपो ने बनवाया था। मठ में 10 मंदिर हैं और यहां मैत्रेय बुद्ध की एक मनमोहक प्रतिमा भी है, जो 14 मीटर ऊंची है। यह प्रतिमा 1970 में 14वें दलाई लामा की यात्रा की स्मृति में बनाई गई थी।
मठ में एक लामो खांग है, जो रक्षक देवता पालदो लामा को समर्पित है। इसके साथ ही यहां देवी तारा को समर्पित एक मंदिर भी है। पर्यटकों को सुबह की प्रार्थना में शामिल होने की अनुमति है, जिसके बाद सूत्रों का पाठ (पवित्र बौद्ध शिक्षाओं का सस्वर पाठ) होता है।
यहां का वार्षिक उत्सव अक्टूबर या नवंबर के महीने में होता है, जिसमें छम और मुखौटा नृत्य किया जाता है। उत्सव के दौरान मठ की तलहटी में एक व्यापार मेला भी लगता है, जिसमें आम जनता भी हिस्सा लेती है।
दिस्कित मठ (Diskit Monastery)

दिस्कित मठ फूलों की घाटी यानी नुब्रा घाटी में शांत भाव से विराजमान है। इसकी स्थापना 14वीं सदी में चांगज़ेम त्सेरा ज़ांगपो ने की थी। यह इस क्षेत्र का सबसे पुराना गोम्पा है और थिकसे मठ की शाखा है। यह लेह से 114 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है; पर्यटकों को सलाह दी जाती है कि यात्रा के लिए टैक्सी लें।
यह मनमोहक मठ तीन हिस्सों में बंटा है। पहले हिस्से में पुराना दुखांग (सभा भवन) और पुराना ज़िमशुंग (विशिष्ट कक्ष) है, जो लामाओं के लिए आरक्षित है। मठ के दूसरे हिस्से में नया दुखांग और नया ज़िमशुंग है, जबकि मठ का आखिरी हिस्सा सबसे पुराना है, जिसमें एक प्रार्थना कक्ष है जहां सभी लामा प्रार्थना करते हैं, और एक रबसाल (लकड़ी की बालकनी) भी है।
यहां आपको बुद्ध की प्राचीन छवियां और पवित्र देवताओं के चित्र देखने को मिलेंगे। यहां का वार्षिक उत्सव "दोस्मोचे" या "बलि के बकरे का उत्सव" फरवरी के महीने में होता है। नुब्रा घाटी के लोग बड़ी संख्या में इस उत्सव में शामिल होते हैं और इसे धूमधाम से मनाते हैं।
लिकिर मठ (Likir Monastery)

हमारी सूची में अगला नाम है मनमोहक लिकिर मठ। यह लेह शहर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर है। इस मठ की स्थापना 1065 में लामा दुवांग चोसजे ने की थी। मठ की लोकेशन दूर-दूर से पर्यटकों को खींच लाती है। मठ का परिसर 15वीं सदी के दौरान बढ़ाया गया था, हालांकि आज हम जो गोम्पा देखते हैं वह 18वीं सदी में बना, क्योंकि पहले वाला आग में नष्ट हो गया था।
मठ में एक संग्रहालय है, जिसमें बौद्ध अवशेष और कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। यहां दो दुखांग हैं। पुराने दुखांग में अमिताभ बुद्ध, शाक्यमुनि बुद्ध, मैत्रेय और जे चोंखापा की प्रतिमाएं हैं, जबकि नए दुखांग में अवलोकितेश्वर की प्रतिमा है।
पहाड़ों और हरी-भरी घाटियों की खूबसूरत गोद में बसा लिकिर पर्यटकों को एक शांत और सौहार्दपूर्ण माहौल देता है। आध्यात्मिक शांति की तलाश में निकले लोग अक्सर भिक्षुओं से ज्ञान और मार्गदर्शन पाने के लिए यहां आते हैं।
अल्ची मठ (Alchi Monastery)

पहाड़ों की गोद में शांति से बसा अल्ची मठ अल्ची गांव में स्थित है। यह लेह से 65 किलोमीटर की दूरी पर है। माना जाता है कि इस मठ की नींव तिब्बती विद्वान रिनचेन ज़ांगपो ने 958 से 1055 के बीच रखी थी। हालांकि, प्राचीन बौद्ध अभिलेखों के अनुसार मठ के निर्माण का श्रेय 11वीं सदी में एक अन्य तिब्बती कुलीन काल-दान शेस-रब (Kal-dan Shes-rab) को दिया जाता है।
मठ में तीन मंदिर हैं। पहला है दुखांग (सभा भवन), जहां भिक्षु पूजा करते हैं और तरह-तरह के अनुष्ठान करते हैं। दूसरा मंदिर अपनी चतुर्भुज बोधिसत्व प्रतिमा के लिए मशहूर है और सुमस्तेक कहलाता है। मठ की तीसरी इमारत मंजुश्री मंदिर है, जिसे जम्पे खाकांग भी कहा जाता है। इस मंदिर में रिनचेन ज़ांगपो का एक चित्र है।
यह मठ बौद्ध और कश्मीरी, दोनों शैलियों का संगम है। मठ के भीतर के भित्ति चित्र उस दौर की झलक भी दिखाते हैं जब लद्दाख की धरती पर हिंदू राजाओं का शासन था। अल्ची में बौद्ध राजाओं का कलात्मक चित्रण देखा जा सकता है। अल्ची मठ लद्दाख के सबसे पुराने चित्रों का घर भी है।

अल्ची दुनिया भर से पर्यटकों और ज्ञान की तलाश में निकले लोगों को आकर्षित करता है। मठ की लोकेशन रोमांच के शौकीनों के लिए भी एकदम सही जगह है, क्योंकि मठ ज़ांस्कर नदी के पास है, जहां रिवर राफ्टिंग जैसे कई एडवेंचर स्पोर्ट्स होते हैं।
लामायुरु मठ (Lamayuru Monastery)

लामायुरु या युरु मठ, जिसे थारपा लिंग (मुक्ति का स्थान) भी कहा जाता है, अपनी चित्र-सी सुंदर लोकेशन, मोहक नज़ारों, मंत्रमुग्ध कर देने वाली ज़मीन और समर्पित भिक्षुओं के लिए जाना जाता है। यह मठ लेह से 125 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और 150 भिक्षुओं का घर है। चांद जैसी दिखने वाली अपनी ज़मीन की वजह से इसे लद्दाख का मूनलैंड भी कहा जाता है।
माना जाता है कि इस मठ की नींव 11वीं सदी में बौद्ध विद्वान नारोपा ने रखी थी। पहले इस मठ के अधीन पांच विशाल इमारतें थीं, लेकिन आज केवल एक इमारत ही बची है। मठ में कुछ मंदिर हैं, जैसे सेंगे ल्हाखांग मंदिर, गोनखांग मंदिर और दुखांग (सभा भवन), जिसके भीतर एक छोटी गुफा भी है जहां नारोपा ने कई वर्षों तक ध्यान किया था। मठ की भीतरी दीवारों पर ऐसे भित्ति चित्र बने हैं जो दर्शाते हैं कि एक लामा को कैसे जीवन जीना चाहिए।

यहां पर्यटकों को खींचने वाली कई चीज़ें हैं, जिनमें से एक है युरु काबग्यात उत्सव। दो दिन का यह उत्सव अपने अनूठे मुखौटा नृत्यों और पवित्र अनुष्ठानों की वजह से मास्क फेस्टिवल के नाम से मशहूर है। यह जुलाई और अगस्त के बीच होता है। दुनिया के कई हिस्सों से भिक्षु इस उत्सव में शामिल होते हैं।
इसके अलावा, आप वानला जैसी आसपास की जगहों की ट्रेकिंग पर भी जा सकते हैं। शांति और सुकून की तलाश में निकले लोगों के लिए भी यह मठ एक बेहतरीन ठिकाना है।
फुगताल मठ (Phugtal Monastery)

लद्दाख के सबसे एकांत और दुर्गम मठों में से एक है फुगताल मठ, जो फुकताल या फुगताल नाम की एकांत बस्ती में स्थित है। इसे फुतकाल मठ या फुतकाल गोम्पा भी कहा जाता है।
इस मठ की स्थापना 12वीं सदी में गांगसेम शेरप संपो ने की थी। यह एक प्राकृतिक गुफा के चारों ओर बना है, इसलिए इसे गुफा मठ या गुफा गोम्पा भी कहा जाता है। इस जगह तक केवल पैदल ही पहुंचा जा सकता है। सबसे नज़दीकी कस्बा पदुम है, जहां से सड़क के रास्ते लचर पहुंचा जा सकता है और फिर मठ तक की ट्रेक शुरू होती है। यह ट्रेक हरी-भरी वनस्पति, सुंदर नज़ारों और खामोश वीरान ज़मीन के बीच से गुज़रती है। यह पर्यटकों को एक अलग ही अनुभव देती है, जो किसी एडवेंचर गतिविधि से कम नहीं है।
यह मठ बुद्ध के अनुयायियों, जैसे अर्हतों और गुरु पद्मसंभव को समर्पित है। मठ में मुख्य मंदिर, प्रार्थना कक्ष, रहने के कमरे और एक पवित्र जलधारा है। इस मठ में लगभग 100 भिक्षु रहते हैं।
फुगताल में कई तरह के उत्सव मनाए जाते हैं, और इन सबका बौद्ध धर्म में बड़ा महत्व है। उत्सव फरवरी के आसपास शुरू होते हैं और साल भर चलते रहते हैं। इनमें स्मोनलम चेनमो (जो नए साल की शुरुआत का प्रतीक है), चुदसुम चोदपा, चोंगा चोदपा, यारनास आदि उत्सव शामिल हैं। उत्सवों के समय भिक्षु स्थानीय लोगों या आसपास के गांव वालों से मिलते-जुलते हैं। इन्हीं उत्सवों के ज़रिए वे बुद्ध की शिक्षाओं और धर्म का प्रचार करते हैं।
स्टाकना मठ (Stakna Monastery)

अगला है स्टाकना मठ, जिसे टाइगर्स नोज़ मठ यानी बाघ की नाक वाला मठ भी कहा जाता है, क्योंकि जिस चट्टान पर यह बना है उसका आकार वैसा ही है। इसकी स्थापना 16वीं सदी में भूटानी विद्वान चोसजे मोदज़िन ने की थी। यह लेह से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
यह मठ बौद्ध धर्म का गहरा ज्ञान देता है। यहां दुखांग नाम का एक विशाल सभा भवन है, जिसमें शाक्यमुनि, आमची और त्सेफाकमद के खूबसूरत चित्र हैं। यह मठ लगभग 30 भिक्षुओं का घर है। आर्य अवलोकितेश्वर की प्रतिमा असम के कामरूप से लाई गई थी और पर्यटकों के बीच यह आकर्षण का बड़ा केंद्र है।
मठ की लोकेशन पर्यटकों को आसपास का विहंगम नज़ारा दिखाती है। मठ की छत से सिंधु नदी का शानदार नज़ारा देखा जा सकता है।
स्टोक मठ (Stok Monastery)

स्टोक मठ की स्थापना 14वीं सदी में लामा ल्हावांग लोटस ने की थी। यह लेह से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मठ अपने पुस्तकालय के लिए मशहूर है, जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं के पवित्र 108 खंड हैं, जिन्हें कांग्युर कहा जाता है।
मठ में एक मुख्य सभा भवन है, जहां भिक्षु पूजा और प्रार्थना करते हैं। इसे खूबसूरत रंगों से रंगा गया है और आसपास के कमरे पताकाओं से सजे हैं। प्रवेश द्वार पर रक्षक देव आकृतियों के चित्र देखे जा सकते हैं। यहां देवी-देवताओं के कई चित्र हैं। नए मंदिर में अवलोकितेश्वर की एक विशाल छवि प्रदर्शित है, जिसकी लगभग 1000 भुजाएं (यह भगवान की शक्ति दर्शाने के लिए है) और 11 सिर हैं। माना जाता है कि मठ का सबसे पुराना हिस्सा 550 साल पुराना है, जबकि दुखांग सिर्फ़ 50 साल पुराना है।
मठ में हर साल मास्क फेस्टिवल यानी मुखौटा उत्सव मनाया जाता है, जिसमें अलग-अलग नृत्य शैलियां पेश की जाती हैं। यह उत्सव अपने लज़ीज़ पकवानों और सुकून देने वाले संगीत के लिए भी लोकप्रिय है।
मठ के आसपास के इलाकों में ट्रेकिंग की ढेरों जगहें हैं, साथ ही मशहूर स्टोक कांगड़ी पर्वत शृंखला भी है, जो रोमांच के शौकीनों की पसंदीदा जगह है। पर्यटक स्टोक पैलेस भी देखने जाते हैं, जो मठ से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह महल 1820 में बना था और आज भी लद्दाख के राजपरिवार का निवास है।
बौद्ध संस्कृति लद्दाख के इतिहास में बहुत पीछे तक जाती है और आज भी इस क्षेत्र की हवा में महसूस होती है। सैकड़ों और हज़ारों साल पहले स्थापित हुए बौद्ध मठ आज भी भगवान बुद्ध की शिक्षाएं फैलाने का काम कर रहे हैं। बौद्ध धर्म का सार यहां के स्थानीय लोगों में देखा जा सकता है, जो हर साल होने वाले उत्सवों में पूरी श्रद्धा से हिस्सा लेते हैं। अन्य भारतीय राज्यों के साथ-साथ लद्दाख भारत का एक अहम बौद्ध केंद्र है। उम्मीद है यह लेख आपके लिए जानकारी से भरा रहा होगा और लद्दाख की अगली यात्रा पर इन मठों को घूमने में आपकी मदद करेगा!
✦ होम Read in English