हम जानते हैं कि इंसान कई क्षमताओं के साथ जन्म लेता है। देखने और महसूस करने जैसी क्षमताओं के दम पर इंसानों ने बहुत कुछ संभव कर दिखाया है। वैसे इन्हें असाधारण क्षमताएँ कहना ठीक नहीं, क्योंकि हर दूसरा जीव भी इंसानों की तरह देख सकता है या प्रतिक्रिया दे सकता है, मगर सोचने और सृजन करने की क्षमता हर किसी के पास नहीं है। तो फिर हमें बाकी जीवों से अलग क्या बनाता है? बुद्धि। हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) यानी AI पर भी बात करेंगे।
बुद्धि वह विषय है जिस पर हर जगह सबसे ज़्यादा बातें होती हैं। आमतौर पर हम यह शब्द तब इस्तेमाल करते हैं जब किसी की क्षमताओं का आकलन करते हैं या किसी के काम की तारीफ करना चाहते हैं। मगर आखिर यह चीज़ है क्या जिसकी हम सब बातें करते हैं? आइए बुद्धि को लेकर अपनी समझ को टटोलते हैं।
बुद्धि उपलब्ध जानकारी (डेटा), ज्ञान, अनुभवों, स्मृतियों और भावनाओं के आधार पर समझने, बोध करने, तर्क करने, योजना बनाने और निर्णय लेने की क्षमता है।
इंसान अपनी इंद्रियों (स्पर्श, दृष्टि, श्रवण, गंध और स्वाद) से अपने आस-पास की जानकारी जुटाते हैं और अलग अलग अनुभवों और भावनाओं से मिली इस जानकारी के आधार पर स्मृतियाँ बनाते हैं।
वे अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय लेते हैं, जिनके पीछे अलग अलग प्रेरणाएँ भी होती हैं (जैसे फायदा, सराहना, भावनाएँ वगैरह)। जानकारी जुटाकर उसे संसाधित करने और निर्णय लेने की इसी क्षमता को बुद्धि कहते हैं।
कुछ लोग कह सकते हैं कि इंसानों के पास सही को गलत से और सद्गुण को दुर्गुण से अलग पहचानने की संज्ञानात्मक क्षमता भी है, और इस क्षमता को विवेक कहा जा सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) क्या है?

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का मतलब है मशीनों में मानव बुद्धि की नकल, जिसमें कंप्यूटर आधारित रोबोट या मशीन इंसान की तरह सोचने और उसके कामों की नकल करने की क्षमता रखती है। AI बड़ी मात्रा में भरे या संग्रहीत डेटा और सेंसरों (मोशन डिटेक्टर, कैमरे, मौसम सेंसर वगैरह) का इस्तेमाल करके आस-पास के माहौल से जानकारी जुटाती है और निर्णय लेती है।
आज की दुनिया में, जहाँ हर चीज़ तकनीक से शुरू होकर तकनीक पर ही खत्म होती है, यह समय की ज़रूरत बन गई है। और समाज की रफ्तार से कदम मिलाने के लिए कई कंपनियों ने AI को इंसानी ज़िंदगी का रोज़मर्रा का हिस्सा बनाने की पहल की है। जैसे SIRI। SIRI की कामयाबी ने AI की माँग पैदा कर दी।
लेकिन मानव बुद्धि में खोट क्या है?

AI के समर्थक कहते हैं कि मानव बुद्धि की एक सीमा है। फ्रंटियर्स (Frontiers) में प्रकाशित लेख के अनुसार, हम सचेत रूप से जितनी संज्ञानात्मक जानकारी संसाधित कर सकते हैं (हमारी कार्यकारी स्मृति, विस्तार या ध्यान), वह बहुत सीमित है। हमारी कार्यकारी स्मृति की क्षमता लगभग 10 से 50 बिट प्रति सेकंड है।
ज़्यादातर संज्ञानात्मक काम, जैसे पाठ पढ़ना या गणना करना, हमारा पूरा ध्यान माँगते हैं और उन्हें पूरा करने में हमें आमतौर पर काफी समय लगता है। मोबाइल कैलकुलेटर हमसे लाखों गुना जटिल गणनाएँ कर सकते हैं।
इंसान कितनी जानकारी जुटा और सहेज सकता है, इसकी एक सीमा है, जबकि मशीनें अकल्पनीय रफ्तार से जानकारी जुटा सकती हैं, सहेज सकती हैं और संसाधित कर सकती हैं, और AI के सहारे सोच-समझकर निर्णय ले सकती हैं।
AI का विकास
1940 के दशक में डिजिटल कंप्यूटर के विकास के बाद से यह साबित होता आया है कि कंप्यूटरों को जटिल काम करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है, जैसे कैलकुलेटर, जिसमें बस कुछ क्लिक से हमें मुश्किल गणनाओं का हल मिल जाता है। AI लगातार विकसित हो रही है ताकि अलग अलग उद्योगों को फायदा पहुँचा सके। कंसल्टेंसी हो, स्वास्थ्य सेवा, वित्त या शिक्षा, हर क्षेत्र अपने कारोबार को धार देने के लिए AI अपना रहा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली मशीनें 5 पहलुओं में महारत रखती हैं: सीखना, तर्क करना, समस्या सुलझाना, बोध और भाषा। AI का लक्ष्य है समस्या को समझ पाना और उसका समाधान निकालना। इसमें मशीन पूरी तरह अपने निर्णयों पर निर्भर रह सकती है और एक साथ कई प्रोग्राम चला सकती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वर्गीकरण।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: कमज़ोर और सशक्त।
- कमज़ोर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Weak AI): यह प्रणाली इस तरह बनाई जाती है कि वह कोई एक खास काम करे। यानी AI वाली मशीन एक समय में एक ही काम करती है। उदाहरण के लिए Apple की SIRI या Amazon की Alexa। यहाँ आप असिस्टेंट से सवाल पूछते हैं और वह आपको जवाब दे देता है।
- सशक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Strong AI): यह प्रणाली ऐसे काम करने के लिए बनाई जाती है जिन्हें इंसानों जैसा माना जाता है। यह जटिल और पेचीदा काम कर सकती है। इन्हें इस तरह प्रोग्राम किया जाता है कि ये किसी भी स्थिति में इंसानों की तरह सोचें और उसका समाधान निकालें। इस तरह की प्रणालियाँ सेल्फ-ड्राइविंग कारों में या अस्पतालों के ऑपरेशन कक्षों में मिल सकती हैं।
क्या AI की कोई सीमाएँ भी हैं?
इस वक्त भी इस बात पर बड़ी बहस चल रही है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव बुद्धि की बराबरी कर सकती है या नहीं। एक तरफ डीप ब्लू (Deep Blue) जैसे कंप्यूटरों ने शतरंज में इंसानों को (विश्व चैंपियन गैरी कास्परोव को) हरा दिया है।
दूसरी तरफ लोगों को AI की सीमाएँ समझ में आने लगी हैं। इंसान निर्णय लेते समय एहसासों और भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं। इंसानी एहसास और भावनाएँ समय के साथ बदलती हैं, एक ही विषय को लेकर भी, और इसी तरह बुद्धि खुद विकसित होती जाती है। जो निर्णय कल सही था, वह कल को गलत हो सकता है।
मगर AI के मामले में निर्णय हमेशा उपलब्ध और भरे गए डेटा के आधार पर लिया जाएगा, जो एक बिंदु पर आकर स्थिर हो जाता है। और आज की तारीख में AI की यह बड़ी सीमा लगती है कि वह खुद को विकसित नहीं कर सकती।
मानव बुद्धि और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में अंतर
मानव बुद्धि इंसान की सोचने, तर्क करने, सीखने, समझने, ढलने, समस्याएँ सुलझाने, निर्णय लेने, जानकारी सँजोने, साथी इंसानों से संवाद करने वगैरह की क्षमता है।
समय के साथ हम विकसित हुए हैं और उसी हिसाब से ढले भी हैं। अपनी शानदार क्षमताओं के बल पर हमने खुद को मौजूदा हालात के मुताबिक निखारा है। मगर क्या मानव बुद्धि और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की कोई तुलना बनती है? क्या AI मानव बुद्धि से आगे निकल जाएगी? आइए देखते हैं।
- इंसान अपनी सोचने की क्षमता के कारण पिछले अनुभवों के आधार पर निर्णय ले सकते हैं। जबकि AI सोच नहीं सकती। वह अपने अंदर डाले गए डेटा और दिए गए निर्देशों के आधार पर जानकारी संसाधित करती है।
- AI मशीनें "कारण और परिणाम" की अवधारणा कभी नहीं समझ सकतीं, क्योंकि उनके पास कोई इंद्रिय बोध नहीं है। सीखने, समझने और फिर अर्जित ज्ञान को तर्क, विवेक और समझ के साथ जोड़कर लागू करने की क्षमता सिर्फ इंसानों के पास है।
Google के इंजीनियरिंग निदेशक रे कर्ज़वील (Ray Kurzweil) एक जाने-माने भविष्यवेत्ता हैं, जिनकी सटीक भविष्यवाणियों का रिकॉर्ड शानदार रहा है। कर्ज़वील का दावा है कि 1990 के दशक से की गई उनकी 147 भविष्यवाणियों में से 86 प्रतिशत सही निकलीं। सबसे चर्चित भविष्यवेत्ताओं में गिने जाने वाले रे कर्ज़वील के अनुसार, 2029 तक कंप्यूटरों के पास इंसानों के बराबर बुद्धि होगी। कर्ज़वील ने Futurism से कहा, "2029 वह तारीख है जो मैं लगातार बताता आया हूँ, जब कोई AI एक मान्य ट्यूरिंग टेस्ट पास कर लेगी और इस तरह इंसानी स्तर की बुद्धि हासिल कर लेगी। 'सिंगुलैरिटी' के लिए मैंने 2045 की तारीख तय की है, जब हम अपनी बनाई बुद्धि के साथ विलय करके अपनी प्रभावी बुद्धि को अरब गुना बढ़ा लेंगे।"
इंसान और AI
Alexa, "The Chainsmokers का Closer" बजाओ।
Alexa, क्या जेलो और बेन की शादी हो गई?
आपने पिछली बार Alexa से कुछ कब माँगा था? या रास्ता खोजने के लिए Google Maps का इस्तेमाल कब किया था?
AI की बढ़ती तरक्की ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम तकनीक को सावधानी से सँभाल पाएँगे या मशीनों के हाथों सब कुछ गँवा बैठेंगे। The Terminator, The Matrix और Transformers जैसी फिल्मों ने झलक दिखा दी है कि मशीनें क्या कुछ कर सकती हैं।
आइए AI के क्षेत्र में इंसानों की कुछ उपलब्धियों पर नज़र डालते हैं।
सेल्फ-ड्राइविंग कारें
बस एक दशक पहले तक सेल्फ-ड्राइविंग कारें किसी सपने जैसी लगती थीं, और आज हम ड्राइवर के बिना चलने वाली कारों की बातें कर रहे हैं। AI ने बहुत कुछ संभव किया है, जिनमें से एक है सेल्फ-ड्राइविंग कार। यह अपने आस-पास के माहौल को भाँप सकती है। यह बिना किसी इंसानी दखल के, पूरी तरह अपने सेंसरों के बोध के आधार पर चलेगी।
सोफिया, द रोबोट (इंसान जैसी दिखने वाली) (रोबोटिक्स)
सोफिया (Sophia) हांगकांग की कंपनी हैनसन रोबोटिक्स (Hanson Robotics) की बनाई एक सामाजिक ह्यूमनॉइड रोबोट है। सोफिया को 14 फरवरी 2016 को सक्रिय किया गया, और मार्च 2016 के मध्य में अमेरिका के ऑस्टिन, टेक्सास में साउथ बाय साउथवेस्ट (SXSW) कार्यक्रम में उसने पहली बार सार्वजनिक रूप से दर्शन दिए।
अक्टूबर 2017 में सोफिया को सऊदी अरब की नागरिकता दी गई और वह किसी भी देश की नागरिकता पाने वाली पहली रोबोट बनी।
इंसानी दुनिया पर AI के असर।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोगों की जगह लेती जा रही है, चाहे बात किसी क्षेत्र में इंसानी भागीदारी घटाने की हो या उन्हें पूरी तरह हटाने की। मशीनें लगभग हर चीज़ का हिस्सा बन चुकी हैं। जो बदलाव हो रहा है वह किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर हो रहा है।
AI सिर्फ उद्योगों से लोगों को हटा नहीं रही, बल्कि इंसानी दुनिया की तस्वीर ही बदल रही है। कितने ही उद्योग हैं जिनमें AI की जड़ें गहराई तक जम चुकी हैं। AI के सकारात्मक असर के साथ साथ नकारात्मक असर भी है। आइए इनमें से कुछ पर नज़र डालते हैं।

- बेरोज़गारी: इंसानी संवाद और भाषा को समझने की अपनी बढ़ती क्षमता के साथ AI कई नौकरियों में इंसानों की जगह पहले ही ले चुकी है। तरह तरह के काम करने में ये बेहद कारगर साबित हुई हैं, जिससे समय के साथ साथ पैसा भी बचता है। इसके फायदे अपनी जगह हैं, मगर नतीजा बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी के रूप में सामने आया। लोग अपनी नौकरियाँ खो रहे हैं और तरक्की के नाम पर तकलीफें झेल रहे हैं।
- AI आतंकवाद का संभावित खतरा: ताकत जब सही ढंग से न सँभाली जाए तो अक्सर विनाश की ओर ले जाती है। आज हमारे बड़े बड़े काम AI कर रही है। हमने निर्णय लेने की बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ उसके हाथों में छोड़ दी हैं। मगर मानव जाति के लिए AI आतंकवाद के संभावित खतरे को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। ऑटोमेशन के सहारे फ़िशिंग, सॉफ्टवेयर में वायरस पहुँचाने और AI प्रणालियों का फायदा उठाने जैसी घिनौनी हरकतों के ज़रिए ये दुनिया को अपनी मनचाही नज़र से देखने-दिखाने में माहिर हैं। परमाणु बम की ही तरह, अगर यह ताकत गलत हाथों में पड़ गई तो सामूहिक विनाश हो सकता है।
- इंसान के अस्तित्व पर सवालिया निशान: सुपरइंटेलिजेंस के विकास के बाद से इंसान अपने ही आविष्कार से डरे हुए हैं। हम इस डर में जी रहे हैं कि मशीनें दुनिया पर कब्ज़ा कर लेंगी और इंसानों से गुलामों जैसा बर्ताव करेंगी। और अब रोबोटों के उभार के साथ इंसानों की चिंता उनकी गर्दन पर लटकती तलवार बन गई है। हम AI से डरते हैं, क्योंकि हमें आशंका है कि वह एक ऐसे मुकाम पर पहुँच जाएगी जहाँ उसे इंसानों के अस्तित्व की परवाह ही नहीं रहेगी।
नवंबर 2017 में Wired को दिए एक इंटरव्यू में प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है। हमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास में आगे बढ़ना है, मगर इसके बहुत वास्तविक खतरों के प्रति सचेत भी रहना है। मुझे डर है कि AI कहीं इंसानों की जगह पूरी तरह न ले ले। अगर लोग कंप्यूटर वायरस बना सकते हैं, तो कोई ऐसी AI भी बनाएगा जो खुद की नकलें तैयार करेगी। यह जीवन का एक नया रूप होगा जो इंसानों को पीछे छोड़ देगा।
क्या दुनिया के दिग्गज AI की बढ़ती ताकत से डरे हुए हैं?
दिवंगत ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने चेतावनी दी थी कि AI का उभार "हमारी सभ्यता के इतिहास की सबसे बुरी घटना" साबित हो सकता है। Tesla के संस्थापक एलन मस्क का मानना है कि AI अनुसंधान एक "अमर तानाशाह" पैदा कर देगा।
"AI मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए एक बुनियादी खतरा है, उस तरह से जिस तरह कार दुर्घटनाएँ, विमान हादसे, खराब दवाएँ या खराब खाना कभी नहीं थे। ये चीज़ें समाज के कुछ लोगों के लिए ज़रूर नुकसानदेह थीं, मगर पूरे समाज के लिए नहीं", मस्क ने नेशनल गवर्नर्स एसोसिएशन में कहा। फिलहाल एलन मस्क अपनी गैर-लाभकारी संस्था Open AI के ज़रिए AI से मुकाबले में जुटे हैं और अपनी कंपनी Neuralink में इंसानी दिमाग को कंप्यूटर से जोड़ने की योजना बना रहे हैं।
न्यूयॉर्क की शोध फर्म Loup Ventures ने हाल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें 4 लोकप्रिय पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट्स के IQ टेस्ट के नतीजे दिए गए: Google Assistant, Siri, Alexa और Cortana। फर्म ने हर डिजिटल असिस्टेंट से 800 सवालों का एक सेट पूछा और फिर जवाबों को दो पैमानों पर परखा: क्या असिस्टेंट ने समझा कि उससे क्या पूछा जा रहा है, और क्या उसने सही जवाब दिया?
चारों डिजिटल असिस्टेंट्स में Google Assistant पहले स्थान पर रहा, जिसने सारे सवाल सही सही समझे और 85.5 प्रतिशत सटीकता से उनके जवाब दिए। उसके बाद Siri रहा, जिसने 99 प्रतिशत सवाल समझे और 78.5 प्रतिशत सटीकता से जवाब दिए। अध्ययन में Cortana और Alexa ने तीसरा और चौथा स्थान पाया, जिन्होंने सवालों को 98 प्रतिशत सटीकता से समझा और क्रमशः 52.4 प्रतिशत और 61.4 प्रतिशत सटीकता से जवाब दिए।
AI में निवेश।
कैलिफोर्निया के स्टैनफोर्ड इंस्टिट्यूट फॉर ह्यूमन-सेंटर्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की प्रकाशित 2019 AI इंडेक्स रिपोर्ट का अनुमान है कि 2019 में AI में वैश्विक निजी निवेश 70 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा था। सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका, चीन और यूरोप का रहा; प्रति व्यक्ति के हिसाब से इज़राइल, सिंगापुर और आइसलैंड भारी निवेश करते पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार AI तकनीकों पर आधारित स्टार्ट-अप इस इकोसिस्टम का बड़ा हिस्सा हैं, जिन्होंने 2019 में दुनिया भर में 37 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश जुटाया, जबकि 2010 में यह आँकड़ा 1.3 अरब डॉलर था।
Gartner Research के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि 37% संगठनों ने किसी न किसी रूप में AI लागू कर ली है। वहीं 80% उभरती तकनीकों की बुनियाद AI होगी। इतना ही नहीं, IDC ने कहा है कि "कृत्रिम बुद्धिमत्ता मुख्यधारा में इसलिए आ गई है क्योंकि यह हमें लगातार बढ़ती भारी मात्रा के डेटा को रीयल-टाइम में समझने लायक बनाती है। वाकई, दुनिया भर का डेटा 2025 तक 61% बढ़कर 175 ज़ेटाबाइट हो जाएगा।"
क्या मशीनें आत्म-चेतन होकर भविष्य में इंसानों को नियंत्रित करेंगी?
AI स्वास्थ्य सेवा, परिवहन, ई-कॉमर्स, विनिर्माण, ग्राहक सेवा, मीडिया जैसे कई उद्योगों पर पहले ही असर डाल चुकी है। समस्याएँ सुलझाने की अपनी शानदार क्षमता के दम पर यह बड़े उद्योगों की पसंदीदा पसंद बनकर उभर रही है। मगर यह घोषित करना अभी जल्दबाज़ी होगी कि भविष्य में ये इंसानों को नियंत्रित करेंगी या नहीं।
जिस बुद्धि से AI बनाई गई है, उसे हराना आसान नहीं। इंसान की सोचने, तर्क करने और सृजन करने की क्षमता की बराबरी कोड और प्रोग्राम नहीं कर सकते। हाँ, AI विकसित हो रही है, मगर वह खुद को सिर्फ नए संस्करण तक ही अपग्रेड कर सकती है, उन इंसानों की तरह नहीं जो इन क्षमताओं के साथ जन्म लेते हैं। रचयिता बनाम रचना की इस दौड़ में आपको क्या लगता है, जीतेगा कौन?
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