आदिम कबीलों से लेकर किसी उच्च शक्ति के अस्तित्व को मानने वालों तक, लगभग सभी धर्म और चिंतन-धाराएँ इस विचार को मानती हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन है। हाँ, मृत्यु के बाद के इस जीवन का स्वरूप और उसके ब्योरे को लेकर विचार ज़रूर अलग अलग हैं।
न्याय की भावना मनुष्य की सबसे बुनियादी प्रेरणाओं में से एक है। लोग अक्सर अपने जीवन में या पूरी दुनिया में अन्याय महसूस करते हैं और इस उम्मीद को थामे रहते हैं कि देर-सवेर न्याय ज़रूर होगा।
स्वर्ग को अक्सर उन लोगों के लिए राहत और सांत्वना की जगह के रूप में चित्रित किया जाता है जिन्होंने धरती पर संघर्ष किया और दुख झेले। जिन्हें असल दुनिया में सुख की तलाश में जूझना पड़ा, उनके लिए यह सौंदर्य और आनंद का लोक है। दूसरी ओर नरक को उन लोगों के लिए यातना का लोक माना जाता है जिन्होंने ईश्वरीय आदेशों की अवहेलना की और बुरे अपराध किए। साथ ही यह वह जगह भी है जहाँ ऐसे लोगों को आखिरकार न्याय का सामना करना पड़ेगा जिन्होंने दूसरों के साथ बुरा किया, मगर इस जीवन में सज़ा से बच निकले।

मृत्यु के बाद के जीवन, स्वर्ग और नरक में विश्वास केवल एक सैद्धांतिक ढाँचा नहीं है, बल्कि दुनिया भर के अनगिनत लोगों की गहरी आस्था है। तमाम तरह के धर्म, चाहे उनका इतिहास और भूगोल कितना भी अलग क्यों न हो, किसी न किसी रूप में परलोक को मानते हैं और यह भी कि जीवन के कर्मों के आधार पर पुरस्कार और दंड मिलता है। एक दूसरे अस्तित्व का यह विचार, जहाँ सदाचारी और धर्मात्मा को फल मिलता है, और मृत्यु के पार जीवन में विश्वास, उन लोगों को सुकून और अर्थ देता है जिन्हें यह मानना कठिन लगता है कि मौत के साथ ही सब कुछ खत्म हो जाता है। अलग अलग मूल के होते हुए भी धार्मिक शिक्षाओं में मिलती-जुलती बातें, और साथ में लोगों के निजी अनुभव और साक्ष्य, इस विश्वास को और मजबूत करते हैं और इसे व्यक्ति की आध्यात्मिकता का बुनियादी हिस्सा बना देते हैं।
सुमेरी चिंतन में स्वर्ग और नरक
माना जाता है कि स्वर्ग के सबसे पुराने लिखित वर्णन सुमेरियों (Sumerians) ने छोड़े हैं। पुरातात्विक खोजों के अनुसार सुमेरी लोग मृत्यु के बाद के ऐसे जीवन में विश्वास रखते थे जिसमें आत्मा मृत्यु के बाद भी जीवित रहती है। उनकी मान्यता में एक नरक था, जहाँ इस जीवन में गलत करने वालों को दंड मिलता, और एक स्वर्ग, जहाँ सदाचारियों को फल मिलता।
मिस्रवासियों की परलोक की अवधारणा

प्राचीन मिस्री मान्यताओं के अनुसार हर किसी को, चाहे वह राजा हो या आम आदमी, मृत्यु के बाद इस जीवन के कर्मों का हिसाब देना होगा। कोई व्यक्ति परलोक में प्रवेश के योग्य है या नहीं, यह जाँचने के लिए उसके हृदय को माट (Ma'at) के पंख के सामने तौला जाता था, जो सत्य, न्याय और व्यवस्था का प्रतीक था। अगर हृदय पापों से भरा होता, तो देवी अम्मित (Ammit) उसे निगल जाती और आत्मा हमेशा के लिए मृत्यु के हवाले हो जाती। लेकिन अगर दिवंगत का हृदय शुद्ध होता, तो उसे परलोक में प्रवेश की अनुमति मिलती और वह आरू (Aaru) के खेतों में या पाताल लोक में सदा के लिए जीवित रहता।
प्राचीन ईरानी (पारसी) परलोक-मान्यताएँ

ज़रथुष्ट्र (Zoroaster) द्वारा स्थापित पारसी धर्म में दो ब्रह्मांडीय शक्तियाँ आपस में टकराती हैं। ये हैं अच्छाई और बुराई। ज़रथुष्ट्र का कहना था कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से अच्छाई या बुराई में से कोई भी राह चुन सकता है। ज़रथुष्ट्र लोगों को नैतिक चुनाव करने के लिए प्रेरित करते हैं। जो सही चुनाव करता है, उसे पारसी धर्म की आज्ञाओं का पालन करना होता है। तभी व्यक्ति ब्रह्मांड में अपना स्थान ग्रहण कर सकता है।
प्राचीन यूनानी पुराणकथाओं में परलोक

यूनानी पुराणकथाओं में बहुदेववादी धार्मिक व्यवस्था प्रचलित है। मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में यूनानी पुराणकथाओं में तरह तरह की जानकारी मिलती है। परलोक का नाम है "हेडीस" (Hades)। कहा जाता है कि हेडीस के द्वार पर तीन सिरों वाला कुत्ता "केर्बेरोस" (Kerberos) पहरा देता है, और जो भीतर चला जाता है वह फिर बाहर नहीं निकल सकता। दिवंगत व्यक्ति की आत्मा को "हर्मीस" (Hermes) हेडीस को सौंपता है। यहाँ आत्माओं का न्याय होता है। निर्दोष आत्माओं को नाविक "खारोन" (Kharon) एलीसियम (Elysium) के बागों और चरागाहों तक पहुँचाता है। "एलीसियम" नाम का यह स्वर्ग धरती के पश्चिमी तट से दूर के द्वीपों पर बसा माना जाता है। स्वर्गवासी यहाँ खेलों में हिस्सा लेते हैं, क्रीड़ा करते हैं, घुड़सवारी करते हैं और संगीत बजाते हैं। इस स्वर्ग में खिले हुए रंग-बिरंगे फूल भी मिलते हैं। धर्मात्मा और सज्जन यहाँ सदा के लिए बसने आते हैं। हेडीस में न्याय करने वाली आत्माएँ दोषी पाई गई आत्माओं को तरह तरह से दंडित करती हैं। "टार्टरोस" (Tartaros), जिसे प्रायः नरक कहा जाता है, एक बहुत गहरा और अंधकारमय गड्ढा है। प्राचीन यूनानियों के धर्म सिखाते थे कि जो ईश्वर की अवज्ञा करते हैं, उन्हें हमेशा के लिए नरक में फेंक दिया जाता है। इसके अलावा जो अपने माता-पिता को गहरी चोट पहुँचाकर बाद में पछताते हैं, जिन्हें मृत्युदंड मिला हो मगर सज़ा बदल दी गई हो, और जो आत्महत्या करते हैं, वे सब भी टार्टरोस में दंड भोगते हैं।
मूल अमेरिकी जनजातियों के स्वर्ग और नरक
प्राचीन अमेरिका के मूल निवासियों के धर्मों में बहुदेववादी विश्वास-प्रणाली का बोलबाला था। माना जाता था कि कुछ देवता आकाश में हैं, जबकि कुछ धरती पर या उसके नीचे। मृत्यु के बाद स्वर्ग और नरक का विचार इनमें से कुछ कबीलाई धर्मों में मौजूद था। उदाहरण के लिए, कहा जाता है कि एज़्टेक (Aztec) सभ्यता में एक ऐसी दुनिया की अवधारणा थी जिसमें ज़मीन के नीचे 9 लोक और धरती के ऊपर 13 स्वर्ग थे।
हिंदू धर्म में परलोक की मान्यताएँ
हिंदू धर्म ऐसा धर्म है जिसमें मृत्यु और उसके बाद के जीवन से जुड़ी मान्यताओं को बहुत महत्व दिया जाता है। हिंदू धर्म में मृत्यु को परम आत्मा ब्रह्म से एकाकार होने की यात्रा का एक अहम पड़ाव माना जाता है। पुनर्जन्म में विश्वास, जिसमें आत्मा नया रूप धारण कर फिर जन्म लेती है, मृत्यु को लेकर हिंदू दृष्टिकोण के केंद्र में है। अगले जन्म में आत्मा कौन सा रूप लेगी, यह व्यक्ति के पिछले जीवन के कर्मों से तय होता है।

मान्यता है कि मृत्यु से पुनर्जन्म के बीच की यात्रा में आत्मा कई लोकों में जा सकती है। इनमें 7 ऊपरी लोक और 7 निचले लोक शामिल हैं। भूः, भुवः और स्वः जैसे ऊपरी लोक वे स्थान हैं जहाँ धर्मात्मा लोग अपने अच्छे कर्मों का फल भोगने जाते हैं। अतल और पाताल जैसे निचले लोक वे स्थान हैं जहाँ दुष्ट लोग अपने कर्मों का दंड भोगते हैं।
पुनर्जन्म की अवधारणा हिंदू विश्वास-प्रणाली और आत्मा की यात्रा का अनिवार्य हिस्सा मानी जाती है। इस यात्रा में आत्मा ब्रह्म से एकाकार होने का प्रयास करती है, और मान्यता है कि मृत्यु आत्मा को इस परम लक्ष्य के और करीब ले आती है। पुनर्जन्म में विश्वास के चलते भूत-प्रेतों में विश्वास की ज़रूरत ही नहीं रहती, क्योंकि आत्मा के पास जाने के लिए हमेशा कोई न कोई ठिकाना होता है। हिंदू धर्म में मृत्यु को आशावादी नज़रिए से देखा जाता है, ब्रह्म से एकाकार होने की यात्रा के उत्सव के रूप में।
बौद्ध धर्म में परलोक की मान्यताएँ
बौद्ध धर्म आत्माओं की अमरता और पुनर्जन्म की अवधारणा में विश्वास रखता है, जिसमें आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है और संसार में लौट आती है। बौद्ध धर्म के अनुसार, जब धर्मात्मा लोग मरते हैं, तो वे अपनी धार्मिकता की मात्रा के अनुसार किसी दिव्य स्वर्ग में देवताओं के साथ आनंद भोगते हैं। लेकिन यह दिव्य सुख स्थायी नहीं है।

व्यक्ति अपने जीवन के अच्छे कर्मों के आधार पर दिव्य स्वर्ग में थोड़े या लंबे समय तक रह सकता है। उसके बाद वह किसी दूसरे शरीर में पुनर्जन्म लेकर संसार में लौट आएगा। बौद्ध धर्म में मेरु पर्वत की चोटी पर स्थित एक और स्वर्ग का भी उल्लेख मिलता है। बौद्ध धर्म में मृत्यु के बाद पापियों को दंड दो तरह से मिलता है: या तो उनकी आत्मा को उसी प्राणी के शरीर में संसार में वापस भेजकर जिससे वे घृणा करते थे, या फिर उसे नरक में डालकर। बौद्ध धर्म में न स्वर्ग स्थायी है, न नरक, क्योंकि दोनों पुनर्जन्म के चक्र का हिस्सा हैं। नरक पापियों के लिए प्रायश्चित का स्थान है, और जब आत्माएँ इस चक्र से मुक्त हो जाती हैं, तो उन्हें शाश्वत जीवन और सुख प्राप्त होता है। बौद्ध धर्म में शाश्वत मुक्ति और सुख निर्वाण प्राप्त करके पाया जा सकता है।
यहूदी धर्म में स्वर्ग और नरक
पारंपरिक यहूदी धर्म में परलोक धार्मिक चिंतन का केंद्रीय विषय नहीं है, और मृत्यु के बाद ठीक ठीक क्या होता है, इसके ब्योरे तय नहीं किए गए हैं। मान्यता है कि आत्मा शरीर छोड़कर शिओल (Sheol) नाम की जगह जाती है, जिसे अक्सर छायाओं का लोक कहा जाता है, जहाँ सभी मृतक वास करते हैं। माना जाता है कि इस लोक में मृतक नींद या अचेतना जैसी अवस्था में रहते हैं, मसीहा के आगमन और अंततः मृतकों के पुनरुत्थान की प्रतीक्षा करते हुए।

मसीहाई युग में मृतकों को फिर से जीवित किया जाएगा और उनके जीवन के कर्मों के आधार पर उनका न्याय होगा। धर्मात्माओं को शारीरिक और आध्यात्मिक पूर्णता की अवस्था में शाश्वत जीवन मिलेगा, जिसे अक्सर ओलम हबा (Olam HaBa) यानी "आने वाली दुनिया" कहा जाता है, जबकि दुष्टों को दंड मिलेगा। इस पुरस्कार और दंड का ठीक ठीक स्वरूप पारंपरिक यहूदी धर्म में स्पष्ट नहीं किया गया है, मगर बाद के कुछ कबालिस्टिक (Kabbalistic) और हसीदी (Hasidic) ग्रंथ ऐसे परलोक का वर्णन करते हैं जिसमें पुरस्कार और दंड के अलग अलग स्तर हैं, और स्वर्ग तथा नरक दो विपरीत गंतव्यों के रूप में मौजूद हैं।
यह बात भी ध्यान देने लायक है कि बहुत से यहूदियों के लिए असली ज़ोर मृत्यु के बाद की चिंता करने पर नहीं, बल्कि इसी दुनिया में सदाचारी और सार्थक जीवन जीने पर है। दुनिया को बेहतर बनाना और अपनी क्षमताओं को पूरा करना, परलोक के बारे में अटकलें लगाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।
ईसाई धर्म और स्वर्ग-नरक

स्वर्ग और नरक का विचार, और साथ ही परलोक, ईसाई धर्म के लिए बुनियादी हैं। परलोक का वर्णन सबसे पहले इब्रानी धर्मग्रंथों (पुराने नियम) में मिलता है, मगर स्वर्ग और नरक के विचारों को विस्तार और स्पष्ट परिभाषाएँ नए नियम (New Testament) में ही मिलती हैं।
ईसाई मान्यता के अनुसार स्वर्ग वह जगह है जहाँ परमेश्वर का वास है और जहाँ मुक्ति पाए हुए लोग अनंत काल तक परम आनंद और सुख में रहेंगे, परमेश्वर और बाकी सभी उद्धार पाई आत्माओं के साथ। बाइबल इसे कभी न खत्म होने वाली शांति, आनंद, प्रेम और प्रकाश की जगह बताती है, जहाँ न पीड़ा है, न पाप, न मृत्यु। हालाँकि बाइबल यह ठीक ठीक नहीं बताती कि स्वर्ग कैसा होगा, और ईसाइयों के बीच इसकी कल्पनाएँ अलग अलग हैं। कुछ मानते हैं कि यह एक भौतिक स्थान होगा, तो कुछ के अनुसार यह आत्मा की एक अवस्था होगी।
दूसरी ओर नरक वह जगह है जहाँ ईसा मसीह को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता मानने से इनकार करने वाले लोग अनंत काल तक यातना में रहेंगे। इस लोक को अंधकार, आग और पीड़ा से भरा बताया गया है, जहाँ दुष्टों को उनके कुकर्मों का दंड अनंत काल तक मिलेगा। नरक की कल्पना यातना के ऐसे लोक के रूप में की गई है जिसका उद्देश्य है ईसा मसीह को प्रभु और उद्धारकर्ता मानने से इनकार करने वालों को चेतावनी देना और लोगों को अच्छा जीवन जीने की प्रेरणा देना।
ईसाई धर्म के अनुसार, कोई व्यक्ति ईसा मसीह को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता स्वीकार करता है या नहीं, यही निर्णय मृत्यु के बाद उसकी नियति तय करेगा। ईसाई धर्म ईसा में विश्वास के ज़रिए मुक्ति के विचार पर केंद्रित है, और यह दृढ़ धारणा कि मृत्यु के बाद अंतिम ठिकाने के रूप में स्वर्ग या नरक में से कोई एक मिलेगा, अच्छा जीवन जीने और दूसरों तक सुसमाचार पहुँचाने की प्रेरणा मानी जाती है।
यह याद रखना बेहद ज़रूरी है कि स्वर्ग और नरक के ब्योरे, और परलोक में क्या होगा, यह सब हमारे लिए अज्ञात और समझ से परे है। ईसाइयों का विश्वास है कि अंत में परलोक के लिए परमेश्वर की मंशा और योजनाएँ उसकी परिपूर्ण व्यवस्था और बुद्धिमत्ता में प्रकट होंगी और साकार होंगी।
इस्लाम में जन्नत और जहन्नुम
कुरान में जन्नत वह जगह है जहाँ अल्लाह पर ईमान रखने वाले और ईश्वरीय संदेशों को सुनने वाले, नैतिक ढंग से जीवन जीने वाले और मानवता की भलाई के लिए अच्छे काम करने वाले लोगों को शाश्वत सुख का इनाम मिलता है। जन्नत ईमान वालों का इनाम है और यह ऐसी अनोखी सुंदरता से भरी जगह है जिसमें वह सब कुछ है जो न आँखों ने देखा, न कानों ने सुना, और न इंसान के मन में कभी आया। जन्नत में सब कुछ व्यक्ति की इच्छा के अनुसार होता है और वह जो भी चाहे, तुरंत हाज़िर हो जाता है। जन्नत में न बीमारी है, न डर, न ग़म। लोग जवान रहते हैं, बूढ़े नहीं होते, और जीवन शाश्वत है। वहाँ मृत्यु नहीं है और जो जन्नत में दाखिल हो जाते हैं, वे कभी वहाँ से नहीं निकलेंगे और हमेशा सुख और आराम का आनंद लेते रहेंगे। कुरान कई आयतों में जन्नत का विस्तार से वर्णन करता है और बताता है कि जन्नत के वासियों पर सुबह-शाम नेमतें बरसाई जाएँगी। नेमतें असीमित हैं, मगर भूख का एहसास नहीं होता। जन्नत में कामसुख का भी उल्लेख है। जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते, उसके आदेशों का पालन नहीं करते और दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं, उन्हें जहन्नुम में सज़ा दी जाएगी। कुरान में जहन्नुम वह जगह है जहाँ ईमान न रखने वालों को, और ईमान रखकर भी गुनाह करने वालों को, आखिरत में आग से सज़ा दी जाएगी। जो बिना ईमान के मरते हैं, वे वहाँ हमेशा रहेंगे।

जो ईमान तो रखते हैं मगर अल्लाह के आदेशों के अनुसार नहीं चलते और अपने धार्मिक कर्तव्य पूरे नहीं करते, वे एक निश्चित अवधि तक जहन्नुम में रहेंगे, जिसके बाद वे वहाँ से निकलकर जन्नत में दाखिल होंगे। लेकिन काफ़िर और मुनाफ़िक हमेशा जहन्नुम में रहेंगे। कुछ व्याख्याओं के अनुसार जहन्नुम के 7 दरवाज़े हैं, इस कथन के आधार पर कि "हर गिरोह के लिए 7 दरवाज़े हैं।" जहन्नुम का ख़याल आते ही सबसे पहले आग का ध्यान आता है। कुरान जहन्नुम को दीवारों से घिरी जगह बताता है, जिसमें यातना के कई कक्ष हैं और पहरेदार हैं। सज़ा का मुख्य रूप आग है, और यातना देने वालों को निर्दयी, कठोर, सख़्त और बहुत ताक़तवर बताया गया है। कुरान कहता है कि जहन्नुम की ज़िम्मेदारी 19 फ़रिश्तों पर है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष यह कि परलोक, स्वर्ग और नरक में विश्वास कई धर्मों का बुनियादी पहलू है और दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसे मानता है। इन अवधारणाओं को अक्सर इस जीवन के कर्मों के अंतिम पुरस्कार या दंड के रूप में देखा जाता है, और ये आशा और सुकून के साथ साथ भय और सावधानी का स्रोत भी हैं। भले ही इन लोकों का सटीक स्वरूप और वर्णन अलग अलग संस्कृतियों और परंपराओं में बदल जाता हो, मगर मृत्यु के बाद अंतिम न्याय और अंतिम गंतव्य का मूल विचार एक जैसा बना रहता है। आपकी निजी मान्यताएँ जो भी हों, अच्छा जीवन जीना, दूसरों के साथ दयालुता से पेश आना, और व्यक्तिगत विकास तथा संतोष के लिए प्रयास करते रहना ज़रूरी है, क्योंकि यही कर्म एक उज्जवल भविष्य की ओर ले जा सकते हैं, इस दुनिया में भी और उसके पार भी।
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