पत्र पढ़ती एक महिला का चित्रण, जिसे पंखों वाला एक देवदूत सफेद कुमुदिनी के फूल भेंट कर रहा है ✦ होम Read in English

प्राचीन कथाएँ

[कहानी] ईसा मसीह रात के खाने पर आ रहे हैं

एक मनमोहक कहानी जो दिखाती है कि भगवान के दर्शन के योग्य बनने के लिए अमीर होना ज़रूरी नहीं। जानिए एलिज़ाबेथ की दयालुता ने कैसे उसका साथ दिया।

लेखक: · 9 मार्च 2023 · 4 मिनट में पढ़ें


कहानी सुनिए या नीचे पढ़िए।

एलिज़ाबेथ ने डाकपेटी से अभी अभी मिले उस लिफाफे को एक बार फिर देखा। यह बड़ा ही अनोखा था। न कोई टिकट, न कोई डाक की मुहर, बस उसका नाम और पता। अंदर बेहद सुंदर हस्तलेख में लिखा एक पत्र था। उसमें से एक हल्की सी गर्म रोशनी फैल रही थी, और कागज़ को हाथ में थामे हुए उसे लगा जैसे कोई मन को ऊपर उठाने वाला संगीत सुनाई दे रहा हो।

उसने पत्र एक बार और पढ़ा… 

पत्र पढ़ती एलिज़ाबेथ के चारों ओर देवदूत
पत्र पढ़ती एलिज़ाबेथ

“प्रिय एलिज़ाबेथ, 

शनिवार दोपहर को मैं तुम्हारे मोहल्ले में रहूँगा और सोच रहा हूँ कि तुमसे मिलने आऊँ। 

सदा प्रेम सहित, ईसा मसीह” 

पत्र को मेज़ पर रखते हुए उसके हाथ काँप रहे थे। 

- प्रभु भला मुझसे मिलने क्यों आना चाहेंगे? मैं तो कोई खास इंसान नहीं। मेरे पास तो देने को कुछ भी नहीं है।

यह सोचते ही एलिज़ाबेथ को अपनी रसोई की खाली अलमारियाँ याद आ गईं। “हे भगवान, सच में मेरे पास परोसने को कुछ भी नहीं है। मुझे दौड़कर दुकान जाना होगा और रात के खाने के लिए कुछ खरीदना होगा।” उसने अपना बटुआ उठाया और उसमें रखे पैसे गिने। 7 डॉलर 40 सेंट। 

- चलो, कम से कम थोड़ी ब्रेड और थोड़ा गोश्त तो ले ही सकती हूँ।

उसने झट से कोट पहना और दरवाज़े से बाहर दौड़ पड़ी। उसने एक फ्रेंच ब्रेड, आधा पाउंड कटा हुआ टर्की का गोश्त और दूध का एक डिब्बा खरीदा…अब उसके पास सोमवार तक चलाने के लिए कुल जमा 12 सेंट बचे थे। फिर भी, घर लौटते हुए उसका मन संतुष्ट था, और उसकी छोटी सी भेंट उसकी बगल में दबी थी। 

- सुनिए बहन जी, क्या आप हमारी मदद कर सकती हैं?

एलिज़ाबेथ रात के खाने की तैयारी में इतनी खोई हुई थी कि उसने गली में दुबके दो लोगों पर ध्यान ही नहीं दिया था। एक आदमी और एक औरत, दोनों के तन पर चिथड़ों से ज़्यादा कुछ नहीं था। 

- मेरे पास कोई काम नहीं है, और मैं और मेरी पत्नी यहीं सड़क पर रह रहे हैं, और अब ठंड बढ़ रही है, भूख भी लग रही है, तो अगर आप हमारी कुछ मदद कर सकें, तो बड़ी मेहरबानी होगी।

एलिज़ाबेथ ने दोनों को देखा। वे मैले थे, उनसे बदबू आ रही थी, और उसे पक्का यकीन था कि अगर वे सच में चाहते तो कोई न कोई काम ढूँढ ही सकते थे। 

- भाई साहब, मैं आपकी मदद करना तो चाहती हूँ, पर मैं खुद एक गरीब औरत हूँ। मेरे पास बस थोड़ा सा गोश्त और थोड़ी ब्रेड है, और आज रात मेरे यहाँ एक बहुत खास मेहमान खाने पर आ रहे हैं। मैं यही सब उन्हें परोसने वाली थी।

- समझ गया। फिर भी धन्यवाद।

आदमी ने औरत के कंधों पर हाथ रखा, मुड़ा और वापस गली की ओर चल पड़ा। उन्हें जाते देख एलिज़ाबेथ के दिल में एक कसक सी उठी। 

- भाई साहब, रुकिए!

वह दौड़कर गली में उनके पीछे गई तो दोनों रुककर मुड़े। 

- देखिए, आप यह खाना क्यों नहीं ले लेते? अपने मेहमान के लिए मैं कुछ और सोच लूँगी।

बुज़ुर्ग दंपति को खाना देती एलिज़ाबेथ
बुज़ुर्ग दंपति को खाना देती एलिज़ाबेथ

और उसने सामान का थैला उस आदमी के हाथ में थमा दिया। 

- धन्यवाद बहन जी। बहुत बहुत धन्यवाद!

- हाँ, बहुत धन्यवाद! आदमी की पत्नी ने कहा।

एलिज़ाबेथ देख पा रही थी कि वह औरत ठंड से काँप रही थी। 

- सुनिए, घर पर मेरे पास एक और कोट है। लीजिए, आप यह वाला क्यों नहीं ले लेतीं?

- आप बहुत दयालु हैं। बहुत बहुत धन्यवाद!

एलिज़ाबेथ ने अपने कोट के बटन खोले और उसे औरत के कंधों पर ओढ़ा दिया। फिर मुस्कुराते हुए वह मुड़ी और सड़क की ओर वापस चल दी . . .बिना अपने कोट के, और मेहमान को परोसने के लिए बिना कुछ लिए। अपने घर के दरवाज़े तक पहुँचते पहुँचते वह ठंड से ठिठुर चुकी थी, और चिंता में भी थी। प्रभु मिलने आने वाले थे और उसके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं था। वह बटुए में दरवाज़े की चाबी टटोल ही रही थी कि उसकी नज़र डाकपेटी में रखे एक और लिफाफे पर पड़ी। 

- अजीब बात है। डाकिया आमतौर पर दिन में दो बार तो नहीं आता।

उसने डाकपेटी से लिफाफा निकालकर खोला। कागज़ से बहुत गर्म रोशनी फैल रही थी और उसे देवदूतों का गान सुनाई दे रहा था:

“प्रिय एलिज़ाबेथ, 

तुमसे फिर मिलकर बहुत अच्छा लगा। स्वादिष्ट भोजन के लिए धन्यवाद। और उस सुंदर कोट के लिए भी धन्यवाद। 

सदा प्रेम सहित, ईसा मसीह”