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कला और संस्कृतियात्रा

जापान की 10 प्राचीन परंपराएँ जो आज भी ज़िंदा हैं

जापानी परंपराएँ सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं और आज इन्हें फिर से जीवित किया जा रहा है ताकि जापान की समृद्ध विरासत सुरक्षित रहे

लेखक: · 30 नवंबर 2022 · 9 मिनट में पढ़ें · अपडेट:14 दिसंबर 2022

जापान छह हज़ार से भी ज़्यादा द्वीपों से बना एक देश है। इन अद्भुत द्वीपों की सुहावनी जलवायु और चार अलग-अलग ऋतुएँ मिलकर एक ऐसा देश बनाती हैं जहाँ अनगिनत विविध और दिलचस्प स्थानीय संस्कृतियाँ पलती हैं।

यहाँ गगनचुंबी इमारतें और छोटे-छोटे मंदिर आमने-सामने खड़े मिलते हैं। आँखें चौंधिया देने वाली आधुनिकता और सदियों पुरानी परंपराएँ यहाँ बड़े मेल से साथ-साथ चलती हैं। ऐसा अनुभव आपको दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा। तो पेश है उन प्राचीन जापानी परंपराओं की एक सूची, जिन्हें 21वीं सदी में भी निभाया जा रहा है।

हात्सु मियामाइरी (Hatsu Miyamairi, 初宮参り)

हात्सु मियामाइरी (नवजात शिशु के लिए एक शिंतो संस्कार) एक सांस्कृतिक रीति है जिसे ओमिया माइरी भी कहते हैं, जिसका अर्थ है "मंदिर के दर्शन।" जब नवजात शिशु जीवन के 31 दिन पूरे कर लेता है, तो वह इस पारिवारिक अनुष्ठान के लिए तैयार माना जाता है। इस अनुष्ठान का मकसद है नए बच्चे को आशीर्वाद देना और उसे बुरी किस्मत से बचाना। लड़कों के लिए यह 31 दिन पर होता है और लड़कियों के लिए 33 दिन पर। दादी या नानी नवजात को सफ़ेद किमोनो या कोई भी सफ़ेद पोशाक पहनाकर आशीर्वाद के लिए मंदिर ले जाती हैं।

Hatsu Miyamairi Japanese Tradition
I (Sakura-saku-kuni) took this photograph., Public domain, via Wikimedia Commons

सादो (Sado, 茶道, "चाय का मार्ग")

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सादो, यानी चाय समारोह, जापानी परंपरा के सबसे मशहूर शिष्टाचारों में से एक है। यह चाय बनाने और पीने का एक विधिवत अनुष्ठान है। इस प्रथा की जड़ें चीन में हैं, लेकिन 18वीं सदी के दौरान इसे जापान में ज़बरदस्त लोकप्रियता मिली।

यह समारोह ज़्यादातर किमोनो पहने एक महिला निभाती है, जो माचा चाय का एक प्याला तैयार करती है। मेज़बान के हाथों की हर हरकत "चाय की कला" का हिस्सा मानी जाती है। वह चाय को लकड़ी की मथनी से फेंटती है, जिससे उसका स्वाद और गहरा हो जाता है। जापानी चाय समारोह एक सुरुचिपूर्ण और जटिल अनुष्ठान है, जो सदियों से चला आ रहा है। चाय भले ही कड़वी हो और पीने में मुश्किल लगे, लेकिन यह समारोह उन सबसे खूबसूरत चीज़ों में से है जिन्हें आप कभी अनुभव करेंगे।

इकेबाना (Ikebana, 生け花)

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इकेबाना, यानी फूल सजाने की जापानी कला, सदियों पहले मंदिरों में चढ़ावे के रूप में शुरू हुई थी और वहाँ से आज बहुत आगे निकल आई है। अब यह जापान की एक अनूठी, लोकप्रिय और लगातार नए रूप लेती जीवंत कला है, जिसे विशेषज्ञ और नए सीखने वाले दोनों ही दिल से चाहते हैं।

इसमें फूल, पौधे, पत्तियाँ और टहनियाँ ऋतु के हिसाब से चुनी जाती हैं, ताकि कोई विषय व्यक्त हो या कमरे की सजावट में चार चाँद लगें। यही वजह है कि इसका जापानी चाय समारोह से गहरा नाता है।

बुद्ध को फूल अर्पित करने की रीति को औपचारिक रूप देने वाले चीनी बौद्ध धर्म-प्रचारकों ने छठी सदी में इकेबाना को जापान पहुँचाया। ओनो नो इमोको ने 7वीं सदी की शुरुआत में जापान का पहला पुष्प-सज्जा विद्यालय, इकेनोबो, स्थापित किया।

तेरु तेरु बोज़ु (Teru Teru Bozu, 照る照る 坊主)

"तेरु तेरु बोज़ु" (照る照る 坊主, यानी "चमको चमको भिक्षु") सफ़ेद कागज़ या कपड़े से हाथ से बनाई जाने वाली एक छोटी सी पारंपरिक गुड़िया है, जिसे जापानी किसान धागे से बाँधकर अपनी खिड़कियों के बाहर लटकाने लगे थे। आकार और बनावट में ये हैलोवीन के लिए बनाई जाने वाली भूत गुड़ियों से काफ़ी मिलती-जुलती हैं।

कहा जाता है कि इस ताबीज़ में जादुई शक्तियाँ होती हैं, जो अच्छा मौसम ला सकती हैं और बारिश को रोक या टाल सकती हैं।

"तेरु" जापानी भाषा की एक क्रिया है जिसका अर्थ है "धूप खिलना," और "बोज़ु" का मतलब है बौद्ध भिक्षु, या आज की बोलचाल में "गंजा।" एदो काल में तेरु तेरु बोज़ु शहरी लोगों के बीच खूब लोकप्रिय हो गया। बच्चे जिस दिन अच्छा मौसम चाहते, उससे एक दिन पहले इसे बनाते और गाते, "अच्छे मौसम वाले पुजारी जी, कृपया कल मौसम अच्छा कर देना।"

यामायाकी (Yamayaki, 山焼き)

यामायाकी जापानी भाषा का इकलौता शब्द है जो पहाड़ जलाने की प्रथा को बयान करता है। इस प्रथा की शुरुआत को लेकर कई मत हैं, लेकिन यह साफ़ नहीं है कि तोदाइ-जी और कोफ़ुकु-जी मंदिरों के बीच का विवाद कब शुरू हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि पहाड़ जलाने का काम जंगली जानवरों और हानिकारक कीड़ों जैसे उपद्रवियों को दूर भगाने और मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए किया जाता था। कुछ मानते हैं कि यह देवताओं और आत्माओं के लिए भी किया जाता है। यह प्रथा वसंत से पहले वनस्पति जलाने के लिए निभाई जाती है। पहाड़ को आग के हवाले किया जाता है और साथ में आतिशबाज़ी होती है, जिससे नज़ारा देखते ही बनता है।

मोची बनाना

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जापान में मोची (mochi) बनाना एक ऐसी कला है जिसका इतिहास सदियों पुराना है। मोची चावल से बनी एक मीठी टिकिया है, जिसमें आमतौर पर लाल बीन पेस्ट या अज़ुकी बीन्स भरकर उसे भाप में पकाया जाता है। मोची बनाने की कई शैलियाँ हैं, लेकिन सबसे आम है त्सुकिमी शैली। इसमें मोचिगोमे नाम की एक खास किस्म के चावल को लकड़ी के बड़े हथौड़े से कूटा जाता है। इससे एक लोचदार सा पेस्ट तैयार होता है, जिसे अलग-अलग आकार दिए जाते हैं।

जापानी मोची बनाना बेहद बारीक और समय लेने वाला काम है, जिसमें खूब हुनर और धैर्य चाहिए। लेकिन मोची बनाना अपने आप में काफ़ी सुकून देने वाला भी हो सकता है, क्योंकि तनाव और थकान मिटाने के लिए यह एकदम सही व्यंजन है। यह जापान की सबसे लोकप्रिय मिठाइयों में से भी एक है, जिसका मज़ा हर उम्र के लोग लेते हैं। यह परंपरा पूरे परिवार को एक साथ ले आती है।

सेइज़ा (Seiza, 正座)

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सेइज़ा जापानी तातामी फ़र्श पर बैठने का पारंपरिक तरीका है। औपचारिक मौकों पर, जैसे शिंतो मंदिर के अनुष्ठानों में, बैठने का यही तरीका उचित माना जाता है। इसके अलावा, जापानी कलाओं में इसका खूब इस्तेमाल होता है ताकि व्यक्ति की मुद्रा सुधरे। इसलिए जापानी परंपरा में आगे चलकर दिक्कतों से बचने के लिए इसका अभ्यास ज़रूरी माना जाता है।

जापानी लोग सेइज़ा को बहुत आदर की नज़र से देखते हैं, क्योंकि यह शिष्टाचार दिखाने और क्षमा माँगने का एक तरीका है।

परंपरागत रूप से सही मुद्रा का मतलब है करीने से मोड़े हुए पैर और सीधी रीढ़। साथ ही, पंजे शरीर के नीचे करीने से दबे होने चाहिए। पुराने ज़माने में लोग औपचारिक सभाओं में सेइज़ा में बैठकर ही शामिल हो पाते थे। चाय समारोह और पारंपरिक जापानी प्रस्तुतियों जैसे आयोजनों में सेइज़ा में बैठना आज भी शामिल है।

तोरो नागाशी (Toro Nagashi, 灯籠流し)

तोरो नागाशी, जिसे तैरती लालटेनों के नाम से जाना जाता है, सदियों से जापानी संस्कृति का हिस्सा रही है और आज भी लोकप्रिय है। तैरती लालटेनों की यह जापानी परंपरा आत्माओं की परलोक यात्रा को दर्शाती है। यह उस समय मनाई जाती है जब माना जाता है कि किसी प्रियजन की आत्मा इस दुनिया में लौटती है। इसे जापान की ओबोन छुट्टी पर नदी में तोरो नागाशी के रूप में मनाया जाता है।

तोरो नागाशी को "फ़ेस्टिवल ऑफ़ रिकवरी" यानी उबरने का उत्सव भी कहा जाता है, जो इस रिवाज़ की दुखद शुरुआत से जुड़ा है। इसे पहली बार 1946 में उन लोगों की याद में मनाया गया था, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान टोक्यो और दूसरे जापानी शहरों पर अमेरिकी बमबारी में मारे गए थे। इसीलिए हिरोशिमा जैसी जगहों पर आपको तोरो नागाशी के बड़े सार्वजनिक उत्सव मिलेंगे, जहाँ 10,000 लालटेनें पानी में तैराई जाती हैं। 

हिना नागाशी (Hina Nagashi, 雛流し)

जापानी मान्यता के अनुसार, बच्चों की बुरी किस्मत गुड़ियों में उतारकर समुद्र में बहाई जा सकती है। इसीलिए हिना नागाशी, यानी गुड़िया बहाने की यह प्रथा, जापानियों के बीच तेज़ी से फैली है। इसे जापान में गर्ल्स डे के दिन कई मंदिरों में निभाया जाता है, जिनमें आवाशिमा मंदिर भी शामिल है। लोग इस अनुष्ठान में विश्वास रखते हैं और अपने बच्चों को बुरी किस्मत से बचाने के लिए इसे करते हैं। 

गुड़िया बहाने के अनुष्ठान आठवीं सदी से चले आ रहे हैं। ऐसे ही उत्सव, जो अक्सर नदियों में मनाए जाते थे, कभी पूरे जापान में आम थे। हालाँकि आज के परिवार गर्ल्स डे पर पारंपरिक गुड़ियाँ सजाकर रखना और दिन ढलने से पहले उन्हें समेट लेना ज़्यादा पसंद करते हैं।

वाबी-साबी (Wabi-Sabi, 侘寂)

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वाबी-साबी एक जापानी कला-दर्शन है, जो वस्तुओं और सामग्रियों की अपूर्णता को अपनाता है। यह विचार कहता है कि परिपूर्ण चीज़ें उबाऊ होती हैं, क्योंकि उनमें चौंकाने या दिलचस्पी जगाने वाला तत्व नहीं होता। दूसरे शब्दों में, जब कोई चीज़ बिल्कुल परिपूर्ण ढंग से बनी हो, तो वह साधारण लगने लगती है और हमारा ध्यान नहीं खींच पाती।

वाबी (侘び) एकांत के लिए जापानी शब्द है। यह समाज से दूर, प्रकृति के बीच अकेलेपन के एक सुखद एहसास की ओर इशारा करता है। वाबी प्रकृति के साथ शांति में होने का भाव है, जो दूसरों से कट जाने से अलग बात है। अगर वाबी कोई इंसान होता, तो वह रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बंधनों से मुक्त होकर पहाड़ों की गहराई में किसी झोंपड़ी में सादा जीवन जी रहा होता। साबी (寂び) का अर्थ है "समय की मार खाया हुआ," लेकिन एक सुरुचिपूर्ण, देहाती अंदाज़ में। 

भले ही बहुत से लोग न जानते हों कि वाबी-साबी क्या है, इसका असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखता है। मिसाल के तौर पर, ज़्यादातर फ़र्नीचर में नुकीले किनारे या कोने नहीं होते, जिससे कमरे में प्रवाह और सामंजस्य का एहसास बनता है। इसी तरह हम अक्सर ऐसे डिज़ाइन चुनते हैं जिनमें रंगों की हल्की-हल्की भिन्नताएँ हों या ऐसे तत्व हों जो और बेहतर हो सकते थे। इससे गतिशीलता बनी रहती है और चीज़ें दिलचस्प लगती रहती हैं।


ये पारंपरिक रिवाज़ सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं और आज इन्हें फिर से जीवित किया जा रहा है, ताकि जापान की समृद्ध विरासत सुरक्षित रहे। इस लेख में हमने उनमें से कुछ सबसे दिलचस्प परंपराएँ गिनाई हैं। सच तो यह है कि ऐसे और भी कई अनुष्ठान और परंपराएँ हैं, जिन पर बात होना अभी बाकी है!