पैरेंटिंग यानी बच्चों की परवरिश उन चुनौती भरे कामों में से है जिनमें पूरा ध्यान और देखभाल चाहिए। चाहे आप पहली बार माता-पिता बने हों या आपको परवरिश का पहले से अनुभव हो, हर बार बच्चे को बड़ा करने का अनुभव अलग और अनोखा होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर आप सजग न रहें तो अनजाने में पैरेंटिंग के कुछ नकारात्मक तरीकों में फिसल सकते हैं। आइए बात करते हैं पैरेंटिंग के उन 10 नकारात्मक तरीकों की जिनसे पूरी तरह बचना चाहिए।
पैरेंटिंग किसी एक चीज़ तक सीमित नहीं है, बल्कि कई कामों का मेल है। बच्चे को बड़ा करने का तरीका हर किसी का अलग होता है, फिर भी सबमें कुछ समानताएं और कुछ फ़र्क़ देखे जा सकते हैं। कुछ लोग बच्चों के साथ नरमी भरे तरीके अपनाते हैं, तो कुछ सख़्त तरीकों का सहारा लेते हैं।
हालांकि, इन तरीकों को अपनाते-अपनाते माता-पिता या तो ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त हो जाते हैं या फिर बिल्कुल उलट। ये तौर-तरीके बच्चे के समग्र विकास पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। कई बार खराब परवरिश बच्चे के मन को इतनी गहरी चोट पहुंचा सकती है कि उसका असर आगे चलकर उसके वयस्क जीवन तक दिखता है।
आम तौर पर माता-पिता ऐसे व्यवहार में अनजाने में पड़ जाते हैं। उन्हें ज़्यादातर अपने बर्ताव का एहसास ही नहीं होता और वे इसे सामान्य आचरण मान लेते हैं। फिर भी, कुछ माता-पिता ऐसे हैं जो जानबूझकर ऐसा व्यवहार करते हैं, ज़्यादातर इसलिए कि बचपन में उनके माता-पिता ने उनके साथ भी ऐसा ही किया था। उदाहरण के लिए, कुछ माता-पिता बच्चों को वे चीज़ें और सुविधाएं देने में यक़ीन रखते हैं जिनकी चाह उन्हें खुद बचपन में हमेशा रही थी। अपने मन की बातें इस तरह बच्चे पर थोपना उसके आत्मबल को नुकसान पहुंचा सकता है।
इस लेख के ज़रिए हम पैरेंटिंग के कुछ ऐसे नकारात्मक तरीकों पर बात करेंगे जिन पर ध्यान देना और जिनसे बचना ज़रूरी है। अगर आप पैरेंटिंग में नए हैं या काफ़ी समय से इस भूमिका में हैं, तो आंखें खोल देने वाली कुछ जानकारियों के लिए इसे आख़िर तक पढ़ना न भूलें।
अक्सर अनदेखी रह जाने वाली इन बातों को समझकर आप यह भी जांच सकते हैं कि आप खुद कहां खड़े हैं।
पैरेंटिंग के तरीकों पर आने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि नकारात्मक पैरेंटिंग स्टाइल आख़िर है क्या।
तो शुरू करते हैं!
नकारात्मक पैरेंटिंग स्टाइल क्या है?

एक साथ अपनाए गए कई तौर-तरीकों की शृंखला मिलकर पैरेंटिंग का नकारात्मक स्टाइल बनाती है। खराब परवरिश या नकारात्मक पैरेंटिंग स्टाइल ऐसा कोई भी बर्ताव है जो बच्चे को हानिकारक स्थितियों और व्यवहारों के संपर्क में लाकर उसके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ चरम रूप भी देखे गए हैं, जो शारीरिक और भावनात्मक शोषण तक पहुंच जाते हैं। ये वे चरम मामले हैं जो बच्चे के मन को गंभीर रूप से आहत कर सकते हैं। कच्ची उम्र में ऐसी चीज़ों से सामना बच्चे की सोच को प्रभावित कर सकता है और उसके मनोवैज्ञानिक स्वभाव में दखल दे सकता है।
इसके अलावा, कुछ और पैटर्न भी हैं जो खराब परवरिश के दायरे में आते हैं। जैसे कई माता-पिता अपनी निजी परेशानियों से जूझते-जूझते बच्चों का ख़याल भूल जाते हैं और अपनी समस्याएं बच्चे पर डाल देते हैं, यानी बच्चों पर बेवजह की परेशानियों का बोझ लाद देते हैं। इससे बच्चा उलझन में पड़ जाता है और खुद को कमतर महसूस करने लगता है, जिससे उसका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास घटता है। हमारा अगला भाग पढ़ें, जहां हमने पैरेंटिंग के ऐसे 10 तरीकों पर बात की है जिनसे बचना ज़रूरी है।
पैरेंटिंग के 10 नकारात्मक तरीके जिनसे माता-पिता को बचना चाहिए
हद से ज़्यादा सुरक्षात्मक होना
हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित रहे, इसलिए वे हर क़ीमत पर उसकी हिफ़ाज़त करना चाहते हैं। कभी-कभी तो वे बच्चों को किसी भी ख़तरे से बचाने के लिए अति तक चले जाते हैं। एक हद तक यह ठीक है, लेकिन हद पार होने पर यह बच्चे की मानसिक स्थिति पर असर डाल सकता है और उसके मन में नई गतिविधियां करने का डर बैठा सकता है। ऐसे बच्चे अपने लिए नई चीज़ों में जोखिम लेने से घबराने लगते हैं, जैसे दोस्त बनाना या किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेना।

दूसरे बच्चों से तुलना करना
ज़्यादातर माता-पिता मानते हैं कि किसी दूसरे बच्चे, ख़ासकर किसी ज़्यादा कामयाब बच्चे की मिसाल देकर उनके बच्चे का व्यक्तित्व निखर जाएगा। लेकिन इससे फ़ायदा कम और नुकसान ज़्यादा होता है। लगातार किसी और जैसा बनने की कोशिश में बच्चा आसानी से अपनी पहचान खो सकता है। कई बार यह बच्चे के मन में ज़िंदगी बदल देने वाले सवाल छोड़ जाता है, जैसे कि क्या वह किसी भी चीज़ में अच्छा है या नहीं। इसलिए माता-पिता को बच्चों से पेश आने का अपना तरीका बदलना चाहिए। याद रखें, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ठीक है, लेकिन तुलना बच्चे के व्यक्तित्व को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा सकती है।
बहुत कम या बहुत ज़्यादा अनुशासन
अनुशासन हर किसी के लिए एक निजी चीज़ है। कुछ लोग इसका पूरी लगन से पालन करते हैं, तो कुछ तय नियमों को मानने से इनकार कर देते हैं। लेकिन बच्चों के लिए यह उनकी निजी टू-डू लिस्ट जैसा हो सकता है। छोटे बच्चे अपनी रोज़मर्रा की बातों को समझने के लिए माता-पिता पर निर्भर रहते हैं, कुछ-कुछ एक मार्गदर्शक कैलेंडर की तरह। लेकिन जब उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, तो वे समय का हिसाब खो बैठते हैं और नुकसानदेह व्यवहारों में भी पड़ सकते हैं।

डॉ. गुलोटा यानी जैकलिन गुलोटा (Jaclyn Gulotta), Ph.D., LMHC के अनुसार, "जब माता-पिता नियम या सीमाएं तय नहीं करते, तो नकारात्मक व्यवहार, गुस्से के दौरे, आक्रामकता, अवज्ञा और ध्यान खींचने वाले व्यवहारों का ख़तरा रहता है।"
उन्होंने आगे कहा कि "इसका असर बच्चों पर छोटी और लंबी, दोनों अवधि में पड़ता है कि वे परिस्थितियों का जवाब देना कैसे सीखते हैं। छोटी अवधि में बच्चे हदें लांघ सकते हैं और अपने माता-पिता के लिए उनके मन में सम्मान कम या बिल्कुल नहीं रह सकता। लंबी अवधि में बच्चे यह मानने लग सकते हैं कि सब कुछ उनका हक़ है, और बुरे व्यवहार के बावजूद अपनी मनचाही चीज़ पाने की उम्मीद कर सकते हैं।"
सबके सामने डांटना
बच्चे का मन एक कोरे व्हाइटबोर्ड जैसा साफ़ होता है, उसे भरता है बाहरी माहौल, लोग, मनोरंजन के साधन वगैरह। जब भी बच्चा कोई ग़लती करता है, तो माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया होती है उसे सुधारना या डांटना, और ऐसा करते हुए वे अपने आस-पास का ध्यान ही नहीं रखते। सबके सामने डांटने या टोकने से बच्चे का आत्मविश्वास और आत्मसम्मान घट सकता है। इससे बच्चों में शर्मिंदगी की भावना भी जन्म ले सकती है, जो उन्हें खुद के बारे में और भी कमतर महसूस कराती है। तो अगली बार जब आप अपने बच्चे को कुछ समझाना चाहें, तो अकेले में समझाएं।

बच्चे पर भरोसा न करना
भरोसा उन सबसे अहम चीज़ों में से है जो किसी रिश्ते को बना भी सकती हैं और बिगाड़ भी। इसी तरह माता-पिता और बच्चे का रिश्ता भी भरोसे और विश्वास पर टिका होता है। जब माता-पिता बच्चे पर भरोसा करते हैं तो वह राहत महसूस करता है, और जब भरोसा नहीं करते तो उसके मन में रिश्ते को लेकर ही शक पैदा हो सकता है।
अक्सर माता-पिता बच्चों को कोई काम एक ख़ास तरीके से करने की हिदायत देते हैं, शायद उन्हें लगता है कि बच्चा ग़लती कर बैठेगा। यह माता-पिता की ओर से भरोसे की कमी दिखाता है और बच्चे को अपनी पसंद और फ़ैसलों पर शक करना सिखा देता है। जिन बच्चों को ऐसा बर्ताव झेलना पड़ता है, उन्हें अक्सर ज़िंदगी के अगले पड़ावों पर फ़ैसले लेने में दिक़्क़त आती है।
पर्याप्त समय न देना या ज़रूरत से ज़्यादा दखल देना
बच्चे की दुनिया माता-पिता के इर्द-गिर्द घूमती है, क्योंकि सबसे पहले उसका वास्ता उन्हीं से पड़ता है। इसलिए बच्चे हर समय उनका ध्यान और तवज्जो चाहते हैं। ज़ाहिर है, हर वक़्त उनके साथ समय बिताना मुमकिन नहीं होता, लेकिन माता-पिता के तौर पर आपको हमेशा अपने बच्चे को यह एहसास कराना चाहिए कि उसकी बात सुनी जाती है और वह अहम है।
जब बच्चों को माता-पिता का ध्यान नहीं मिलता, तो वे उनका ध्यान खींचने के लिए अति कर बैठते हैं, उदाहरण के लिए वे चिल्ला सकते हैं या घर में हंगामा मचा सकते हैं। इसी तरह, अगर कम ध्यान देना नुकसानदेह है, तो बच्चे की ज़िंदगी में ज़रूरत से ज़्यादा दखल देना भी हानिकारक माना जाता है, क्योंकि इससे उसे सीखने और बढ़ने की सही जगह नहीं मिल पाती और उसका विकास रुक सकता है।
बच्चे की परेशानी को अनदेखा करना
साथियों का दबाव यानी पियर प्रेशर एक ऐसी चीज़ है जिससे हर बच्चे को ज़िंदगी में कभी न कभी जूझना पड़ता है। ऐसी चुनौतियों से निपटने का तरीका हर बच्चे का अलग होता है। कुछ इसे चुनौती की तरह लेते हैं, तो कुछ घुटते रहते हैं। अक्सर माता-पिता ऐसे मामलों को हल्के में लेते हैं और इसे बच्चे के विकास का हिस्सा मान लेते हैं।
ये परेशानियां बच्चे के मन में नकारात्मक विचार भरकर उसके व्यक्तित्व को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। कभी-कभी बच्चे अपनी कुंठा दूसरी चीज़ों या यहां तक कि लोगों पर भी निकाल सकते हैं। गुस्से की ये समस्याएं किशोरावस्था में गंभीर रूप ले सकती हैं।
उनकी सराहना न करना
तारीफ़ या इनाम मिलने पर किसे अच्छा नहीं लगता? हम सबको लगता है, है ना? इसी तरह बच्चा भी हमेशा अपने माता-पिता की स्वीकृति चाहता है, और जब भी वह कुछ नया करता है तो चाहता है कि उसकी सराहना हो। लेकिन कभी-कभी माता-पिता बच्चे के विकास के इस पहलू पर ध्यान नहीं देते, और बच्चा यही सोचता रह जाता है कि कहीं वह कुछ ग़लत तो नहीं कर रहा। लंबे समय में यह बच्चे की बढ़त और विकास पर असर डाल सकता है और उसके लिए खुद की क़दर करना मुश्किल बना सकता है।
हर बात के लिए उन्हें दोष देना
ग़लतियां विकास का एक ज़रूरी हिस्सा हैं। फिर भी, हर बात पर बच्चे को डांटना या दोष देना उसे अपनी क़ाबिलियत पर शक करना सिखा सकता है। इससे वह खुद को दूसरों से कमतर भी महसूस करने लगता है।

बहुत ज़्यादा सख़्ती करना
बहुत ज़्यादा सख़्ती भी एक ऐसी चीज़ है जो बच्चे का मनोबल गिरा देती है। जितना ज़रूरी उनकी सराहना करना है, उतना ही ज़रूरी उनके साथ लचीला रहना भी है। हर वक़्त यह बताते रहना कि क्या करना है और क्या नहीं, उनकी सीखने की क्षमता को कम कर देता है। इसलिए कभी-कभी बच्चे को खुला भी छोड़ देना चाहिए।
बच्चा जो देखता है, झट से सीख लेता है, इसलिए बच्चों को एक स्वस्थ माहौल देना माता-पिता की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है।
पैरेंटिंग खोजने और सीखने की एक सतत प्रक्रिया है, जिसे कभी-कभी दूसरों को देखकर भी समझा जा सकता है। फिर भी, यह एक अनोखा अनुभव है जिसे हर माता-पिता को खुद महसूस करना और जीना चाहिए। साथ ही, माता-पिता को बच्चों से पेश आने के अपने तरीके की समय-समय पर पड़ताल करते रहना चाहिए।
बच्चों के साथ समझ का रिश्ता बनाना बेहद ज़रूरी है, ताकि उन्हें पनपने और बढ़ने के लिए ऐसा माहौल मिले जो उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति के लिए सही हो। अपनी रणनीति में बस थोड़े से बदलाव करके माता-पिता अपने बच्चे की ज़िंदगी को सेहतमंद भी बना सकते हैं और खुशहाल भी।
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